Friday, 6 October 2017

क्या चीन समाजवादी रह गया है ? अथवा पूंजीवाद का बेलगाम और सफल नेता ? ------ किशन पटनायक

May 18, 2015 at 3:22pm
भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियों की जायज आलोचना करने वाले मुख्यधारा के कम्युनिस्ट दल और भाकपा(माले-लिबरेशन) नरेन्द्र मोदी की चीन यात्रा पर महटिया कर पड़े हैं। इन दलों में से कुछ जो 'चीनेर चैरमैन - आमादेर चैरमैन' का नारा लगाते थे अब तक उस प्रतिबद्धता से मुक्त नहीं हो पाए हैं।
यह छोटा नोट किशन पटनायक की पुस्तिका 'बातचीत के मुद्दे ' (१९९९) से लिया है। पुस्तिका भी पीडीएफ में उपलब्ध है - https://samatavadi.files.wordpress.com/2008/02/batcheet-ke-mudde.pdf
चीन में भारत की तुलना में बहुत ज्यादा विदेशी पूंजी का प्रवेश हो रहा है । चीन के एक निर्धारित इलाके में सघन रूप से पूंजीवादी विकास किया जा रहा है । वहाँ आधुनिक उद्योगों का विकास तीव्रता से हो रहा है । उसको देख कर चीन के औद्योगिक भविष्य के बारे में बहुत बड़ी उम्मीदें लगायी जा रही हैं ।
    चीन के भविष्य के बारे में सन्देह भी पैदा होता है ।संदेह की चर्चा करने के पहले यह समझना होगा कि चीन में पूंजीवादी विकास की सफलता के कारण क्या हैं ?
चीन जैसे विशाल देश का यह औद्योगिक इलाका एक छोटा अंश है । भारत के अनुभव से हम जानते हैं कि एक बड़े देश के छोटे इलाके को आधुनिक उद्योग के द्वारा संपन्न किया जा सकता है। एक बड़े इलाके को पिछड़ा रखकर छोटे हिस्से को समृद्ध करने के सिद्धान्त को ‘आंतरिक उपनिवेश’ का सिद्धान्त कहा जाता है । पिछड़ा अंश उपनिवेश जैसा ही होता है । इस बड़े इलाके में बेरोजगारी बढ़ती है और उद्योगहीनता भी फैलती है ।
विदेशी पूंजी पर चीन सरकार का नियंत्रण अभी भी है । पूंजी निवेश किस क्षेत्र में होगा , किन वस्तुओं के लिए होगा इनका निर्धारण चीन की साम्यवादी सरकार के नियंत्रण से होता है। यानि चीन के अनुशासन के तहत विदेशी पूंजी काम करती है।चीन विश्वव्यापार संगठन का सदस्य नहीं हुआ है ।इसलिए भारत में जिस प्रकार की खुली छूट विदेशी पूंजी को है , वैसी चीन में नहीं है।
    फिर भी कुछ नकारात्मक परिणाम दिखायी देने लगे हैं और चीन के नेतृत्व को चिंतित होना पड़ रहा है । चीन के देहातों में बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है । नयी शिक्षित युवा पीढ़ी में उपभोक्तावादी प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं । चीन में राष्ट्रवादी भावना अटूट है । विदेशी पूंजी से खतरा दिखाई देगा तो राष्ट्रवादी भावना विदेशी पूंजी के खिलाफ भी हो सकती है । इसलिए पूंजीवादी शक्तियाँ चीन को बहुत सारी रियायतें दे रही हैं । जब वे देखेंगी कि चीन में पूंजीवाद जड़ जमा चुका है और चीन का मध्यम वर्ग उपभोक्तावाद को छोड़ नहीं पाएगा तब वे चीन की प्रगति को रोकेंगे ; चीन में उनका साम्राज्यवादी शोषण तेज हो जाएगा । यह संभावना इसलिए दिखती है कि पूर्व एशिया के कई देशों के साथ हाल में ऐसा हुआ है ।
    दूसरे विश्व युद्ध के बाद न सिर्फ सोवियत रूस मजबूत हुआ , बल्कि चीन में भी साम्यवाद की स्थापना हो गयी और समूचे पूर्व एशिया में साम्यवाद के फैलने के डर से पश्चिम के पूंजीवादी देश त्रस्त हो गये । इसलिए जहाँ भी पूंजीवाद बच पाया , वहाँ पूंजीवाद को लोकप्रिय बनाने के लिए वहाँ के पूंजीवाद को नाना प्रकार की रियायतें वे देने लगे । उन देशों के जनसाधारण के सामान्य जीवन को बेहतर बनाने के लिए सलाह और आर्थिक सहयोग देने लगे । युद्ध में जापान की शत्रुता को भूलकर अमेरिका ने उसको सहयोग दिया ।इसी कारण जापान अभूतपूर्व ढंग से विकसित हुआ । दक्षिण कोरिया , हांगकांग , सिंगापुर , ताइवान , मलेशिया ,थाइलैंड आदि का किस्सा भी इसी तरह का था । १९९० में सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप से साम्यवाद का पराभव हो गया । चीन में भी पूंजीवादी नीतियाँ प्रचलित होने लगीं । तब जाकर साम्यवाद का भय पश्चिम के दिमाग से हटा ।उसके बाद पूर्वी एशिया के देशों को जो सहयोग मिलता था उसका अंत हुआ ।पश्चिम के कुछ पूंजीवादी केन्द्रों से साजिश की गयी थी कि एशिया के देशों के आर्थिक विकास को रोका जाए और उनकी अर्थव्यवस्था में यूरोप अमेरिका की बड़ी कंपनियों का आधिपत्य हो। इसी साजिश के तहत इन देशों में वित्तीय संकट पैदा किया गया। संकट से उबरने के लिए इन देशों को मुद्राकोष की शरण में जाना पड़ा । तब मुद्राकोष उन पर अपनी शर्तें लगा रहा है । इन शर्तों का पालन होने पर जापान छोड़कर बाकी एशियाई देशों में यूरोप अमेरिका की कंपनियों का वर्चस्व बढ़ जाएगा ।
    क्या चीन के साथ भी वैसी साजिश होगी ? इसका उत्तर आसान नहीं है ।चीन के लिए सन्तोष का भी कोई कारण नहीं है ।

साभार : 

https://www.facebook.com/notes/aflatoon-afloo

Wednesday, 4 October 2017

प्रगतिशील भ्रम और केजरीवाल ------ विजय राजबली माथुर

दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से स्तीफ़ा देकर बनारस में मोदी के विरुद्ध चुनाव लड़ने का उद्देश्य 2014 में सिर्फ यह था कि, मोदी विरोधी वोटों को केजरीवाल समेट लें और मोदी को आसान जीत दिला दें। ऐसा करके बदले में दिल्ली चुनावों में आर एस एस के प्रचंड समर्थन से  भाजपा को हराकर केजरीवाल पुनः मुख्यमंत्री बन गए। ................................................................................................................................................

 आर एस एस सत्ता पक्ष भाजपा के माध्यम से कब्जा चुका है अब विरोध पक्ष को आ आ पा के माध्यम से कबजाना चाहता है। परंतु 
दुखद तथ्य यह है कि, प्रगतिशील माने जाने वाले विद्वान और दल केजरीवाल और उनके AAP को मोदी / भाजपा विरोधी मानते हुये जनता को गुमराह कर रहे हैं। 
******





 हज़ारे को अगुआ बना कर अरविंद केजरीवाल एक लंबे समय से शोषकों -उतपीडकों का बचाव करने हेतु भ्रष्टाचार का राग आलापते  रहे है। पढे-लिखे मूरखों को अपना पिछलग्गू बनाने मे मिली कामयाबी के आधार पर वह फूले नहीं समा रहे हैं और जोश मे होश खो बैठे हैं। उन्होने अपने विभाग से हड़पे नौ लाख रुपए प्रधानमंत्री कार्यालय को लौटाए थे जो उनकी और तत्कालीन  प्रधानमंत्री  की अंतरंगता का ज्वलंत प्रतीक है। हज़ारे  साहब को निजी अस्पताल मे पी एम साहब ने पुष्प गुच्छ भिजवा कर उनके आंदोलन को अपना मूक समर्थन प्रदान किया था।

हज़ारे आंदोलन को कांग्रेस के मनमोहन गुट/आर एस एस/देशी-विदेशी NGOs का भरपूर समर्थन था । रामदेव का आंदोलन  केवल आर एस एस /विदेशी समर्थन पर आधारित था। इसीलिए  रामदेव के आंदोलन पर हज़ारे आंदोलन  बढ़त कायम कर सका। परंतु दोनों का उद्देश्य एक ही था भारत मे संसदीय लोकतन्त्र को नष्ट करके 'अर्द्ध सैनिक तानाशाही' स्थापित करना।

1974 मे चिम्मन भाई पटेल की गुजरात सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध मे लोकनायक जय प्रकाश नारायण के आंदोलन मे पहली बार नानाजी देशमुख की अगुआई मे आर एस एस ने घुसपैठ की थी और अपार सफलता प्राप्त  थी।1977 की जनता पार्टी सरकार मे अटल बिहारी बाजपाई ने विदेश विभाग मे तथा एल के आडवाणी ने सूचना एवं प्रसारण विभाग मे आर एस एस के लोगो की घुसपैठ करा दी थी। 1980 मे आर एस एस के सहयोग से इंदिरा गांधी की कांग्रेस पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सकी थी। यह आर एस एस की बहुत बड़ी उपलब्धि थी। वी पी सिंह के 'बोफोर्स कमीशन विरोधी आंदोलन' मे घुस कर आर एस एस ने संतुलंनकारी भूमिका निभा कर अपनी शक्ति मे अपार वृद्धि कर ली थी और 'राम मंदिर आंदोलन' की आड़ मे पिछड़े वर्ग के हित मे लागू 'मण्डल कमीशन' रिपोर्ट की धज्जिये उड़ा दी थी। देश को साम्राज्यवादियों के अस्त्र 'सांप्रदायिकता' से दंगो मे फंसा कर अपार जन-धन की क्षति की गई थी।

1998  -2004 के राजग शासन काल मे गृह मंत्रालय और विशेष कर खुफिया विभागो मे आर एस एस की ज़बरदस्त पैठ बना दी गई। इनही तत्वो ने रामदेव को सहानुभूति दिलाने हेतु राम लीला मैदान कांड अंजाम दिलाया। लेकिन रामदेव की मूर्खताओ के कारण जनता मे उनकी कलई खुल गई। अतः  हज़ारे को आगे खड़ा किया गया। जो कुछ हुआ और हो रहा है सब की आँखों के सामने है। जो लोग व्यापारियों,उद्योगपतियों,ब्यूक्रेट्स के शोषण -उत्पीड़न को ढकने हेतु भ्रष्टाचार का जाप कर रहे थे और जनता को उल्टा भड़का रहे थे उनके मास्टर माइंड हीरो अरविंद केजरीवाल 'मतदान' ही नहीं करना चाहते थे और वह मतदाता तक न बने थे जो उनके 'लोकतन्त्र विरोधी' होने और 'तानाशाही समर्थक' होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। 

तत्कालीन  मनमोहन सरकार के वरिष्ठ मंत्री वीरप्पा मोइली ने खुलासा किया था  कि मनमोहन सिंह ने हड़बड़ी मे 'उदारवाद' अर्थात आर्थिक सुधार लागू किए थे जिनसे 'भ्रष्टाचार' मे अपार वृद्धि हुई है। 

तो यह वजह है कि मनमोहन सिंह जी ने आर एस एस को ताकत पहुंचाने हेतु  हज़ारे के आंदोलन को बल प्रदान किया था। सिर्फ और सिर्फ तानाशाही ही भ्रष्टाचार को अनंत काल तक संरक्षण प्रदान कर सकती है और इसी लिए इन आंदोलनकारियों ने लोकतान्त्रिक मूल्यों को नष्ट करने का बीड़ा उठा रखा है। राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति नफरत भर कर ये लोग जनता को लोकतन्त्र से दूर करना चाहते हैं।
दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से स्तीफ़ा देकर बनारस में मोदी के विरुद्ध चुनाव लड़ने का उद्देश्य 2014 में सिर्फ यह था कि, मोदी विरोधी वोटों को केजरीवाल समेट लें और मोदी को आसान जीत दिला दें। ऐसा करके बदले में दिल्ली चुनावों में आर एस एस के प्रचंड समर्थन से  भाजपा को हराकर केजरीवाल पुनः मुख्यमंत्री बन गए। 
आगामी चुनावों में भाजपा की मदद के लिए केजरीवाल आ आ पा को गुजरात, मध्य प्रदेश, हिमाचल,राजस्थान सभी जगह चुनाव लड़ाएँगे जिससे भाजपा विरोधी वोट बाँट कर उसे आसान जीत उपलब्ध करवा  सकें। आर एस एस सत्ता पक्ष भाजपा के माध्यम से कब्जा चुका है अब विरोध पक्ष को आ आ पा के माध्यम से कबजाना चाहता है। परंतु 
दुखद तथ्य यह है कि, प्रगतिशील माने जाने वाले विद्वान और दल केजरीवाल और उनके AAP को मोदी / भाजपा विरोधी मानते हुये जनता को गुमराह कर रहे हैं। 


Monday, 2 October 2017

वैदिक मत में साम्यवाद - कम्यूनिस्ट अवधारणा सहजता से देखी जा सकती है ------ विजय राजबली माथुर

भारतीय कम्यूनिस्टों को जनता के समक्ष जाना चाहिए तभी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति और जनता का शोषण समाप्त किया जा सकता है.दरअसल भारतीय वांग्मय में ही कम्यूनिज्म सफल हो सकता है ,यूरोपीय वांग्मय में इसकी विफलता का कारण भी लागू करने की गलत पद्धतियाँ ही थीं.सम्पूर्ण वैदिक मत और हमारे अर्वाचीन पूर्वजों के इतिहास में कम्यूनिस्ट अवधारणा सहजता से देखी जा सकती है -हमें उसी का आश्रय लेना होगा तभी हम सफल हो सकते हैं - भविष्य तो उज्जवल है बस उसे सही ढंग से कहने की जरूरत भर है. 






वस्तुतः भारत में कम्यूनिज़्म को जातिवाद की समस्या पर ध्यान न देते हुये और रूसी नेताओं की सलाह को भी ठुकराते हुये केवल आर्थिक आधार पर वर्ग - संघर्ष की अवधारणा को साकार करने का राग अलापते हुये एक दक़ियानूसी ढंग से लागू करने की कोशिशें हुईं और समय की नज़ाकत तथा जनता की नब्ज़ को पहचानने की कोई ज़रूरत नहीं समझी गई जिसका दुष्परिणाम है जनता का सहयोग न प्राप्त कर पाना। कामरेड सुभाषिणी भी सच बोलने के नाम पर सच छिपाती रहीं। 1964 में CPI का विभाजन कर CPM के गठन का कारण पार्टी को ब्राह्मण वादी नेतृत्व में उलझाए रखना था। इसी कारण फिर 1967 में CPM का भी विभाजन हुआ और आज तो केले के तने की भांति अनेकानेक कम्युनिस्ट दल हैं और लगभग सभी का नेतृत्व ब्राह्मणों या ब्राह्मण वादियों के हाथों में है जो चाहते हैं कि, obc व sc कामरेड्स से काम तो लिया जाये लेकिन उनको पद न दिये जाएँ। इसी कारण तमाम कामरेड्स सपा और बसपा, राजद,जद(यू ) आदि में चले गए जिससे कम्युनिस्ट पार्टियों का संगठन कमजोर होता रहा लेकिन इनका नेतृत्व इसलिए आत्म - मुग्ध रहा कि, नेतृत्व ब्राह्मण वाद के अधीन रहा। शीर्ष कम्युनिस्ट नेतृत्व खुद में सांप्रदायिक मनोवृत्ति का होने के कारण जातिवाद के उन्मूलन अथवा obc / sc कामरेड्स के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करना चाहता जिस कारण साधारण जनता को जागरूक भी नहीं करता और वह भटक कर सांप्रदायिक / पूंजीवादी दलों को मजबूत कर देती है जो कारपोरेट घरानों के भले की योजनाएँ बनाते हैं, जन - कल्याण कारी नहीं। 
रूस में साम्यवाद के पतन का कारण भी गलत ढंग से लागू किया जाना था और चीन में तो आज साम्यवाद के नाम पर State capitalism ही चल रहा है।  
            *****                                                               *****                                                            *****

Ashwani Srivastava
पिछले तीन दिन से मास्को शहर घूम रहा हूँ । पर मेरा जो विशेष मक़सद था वह है यहाँ रूस के साम्यवाद को समझना , साम्यवाद के पतन के कारणों को समझना । मैने जो कुछ भी समझा , उसे आपसे साझा करने की शुरुआत कर रहा हूँ । किश्त जारी रहेगी - 
आदमी की बेसिक आवश्यकता होती है रोटी कपड़ा और मकान । सोवियत संघ की साम्यवादी सरकार ने इसकी ब्यवस्था की । 1924 में लेनिन की मृत्यु के बाद स्टालिन सत्ता में आये । उसने सोवियत संघ में ज़बरदस्त औद्योगीकरण करवाया और केंद्रीय आर्थिक व्यवस्था बनाई। कृषि और अन्य व्यवसायों का सामूहिकीकरण किया गया, यानि खेत किसानों की निजी संपत्ति न होकर राष्ट्र की संपत्ति हो गए । सन ८२ में जे एन यू से रूसी भाषा पढ़ने आये रामेश्वर सिंह , जो आजकल हिंदी रूसी भाषा मैत्री संघ के अध्यक्ष भी है , बताते है कि उस समय सबके पास मकान थे , स्टोर से हम लोग कपड़े ले आते थे , लगभग ९० रूबल स्टाइपेंट भी मिलता था जो महीने भर ठीक ठाक खाने पीने के लिये पर्याप्त था । लगता था कि साम्यवादी सरकार से बेहतर कुछ है ही नहीं । यही बात हमारे मेज़बान पप्पू जी भी बताते है । बताते है कि ९० रूबल से लेकर १५० रूबल तक ज्यादातर लोगो को स्टाइपेंट मिलता था । बचपन से ही किसे क्या पढ़ना है , तय कर दिया जाता था और विद्यार्थियों को किसी फैक्ट्री से सम्बद्ध कर दिया जाता था जो उसकी पढाई का बोझ उठाने लगता था । लोग खुस थे , मस्त थे । जरूरत के मुताबिक़ सबको मकान मिला था । सभी को स्टोर से कपड़े मिलते थे । सामूहिक खेती होती थी , उत्पादन होते थे । सोवियत रूस दुनिया की एक ताकत थी । सोवियत रूस के पास इतनी सम्पन्नता तो थी ही कि वह दुनिया में अपने खेमे के तमाम देशों की मदद करते हुये , उन्हे कड़े पहरे में रखने मे सफल था । शीत युद्ध के दौरान अमेरिका से प्रतिस्पर्धा चली जिसमें सामरिक, आर्थिक, राजनैतिक और तकनीकी क्षेत्रों में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ थी।गुटनिरपेक्ष भारत मे भी ज्यादातर भारी उद्योग सोवियत रूस ने लगवाये थे । अंतरिक्ष में अमेरिका से आगे पहुँचे थे । भारी उद्योग लगाने में, मिसाइले , लड़ाकू जहाज़ , टैंक आदि बनाने में बहुत माहिर हो गये थे । एक तरह से बहुत आत्मसंतुष्ठ थे रूसी । भारत से दोस्ती परवान पर चढ़ी थी । ७१ मे बंगलादेश को स्वतंत्र कराने मे सोवियत रूस की भूमिका भी बहुत सराहनीय थी । हां सोवियत रूस कड़े पहरे ( iron curtains) मे था । बाहरी दुनिया के लोगो को सामंती दृष्टिकोण वाला मानते हुये शंका की दृष्टि से देखा जाता था और यह भी कहीं ये लोग सोवियत रूस के लोगो को बरगला न दे ।
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=786422318197132&id=100004881137091

*****                                                               *****                                                            *****


Saturday, May 14, 2011
भारत में कम्युनिज्म कैसे कामयाब हो ?
वैदिक मत के अनुसार मानव कौन ?

त्याग-तपस्या से पवित्र -परिपुष्ट हुआ जिसका 'तन'है,
भद्र भावना-भरा स्नेह-संयुक्त शुद्ध जिसका 'मन'है.
होता व्यय नित-प्रति पर -हित में,जिसका शुची संचित 'धन'है,
वही श्रेष्ठ -सच्चा 'मानव'है,धन्य उसी का 'जीवन' है.


इसी को आधार मान कर महर्षि कार्ल मार्क्स द्वारा  साम्यवाद का वह सिद्धान्त प्रतिपादित  किया गया जिसमें मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त करने का मन्त्र बताया गया है. वस्तुतः मैक्स मूलर सा : हमारे देश से जो संस्कृत की मूल -पांडुलिपियाँ ले गए थे और उनके जर्मन अनुवाद में जिनका जिक्र था महर्षि कार्ल मार्क्स ने उनके गहन अध्ययन से जो निष्कर्ष निकाले थे उन्हें 'दास कैपिटल' में लिपिबद्ध किया था और यही ग्रन्थ सम्पूर्ण विश्व में कम्यूनिज्म  का आधिकारिक स्त्रोत है.स्वंय मार्क्स महोदय ने इन सिद्धांतों को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार लागू करने की बात कही है ;परन्तु दुर्भाग्य से हमारे देश में इन्हें लागू करते समय इस देश की परिस्थितियों को नजर-अंदाज कर दिया गया जिसका यह दुष्परिणाम है कि हमारे देश में कम्यूनिज्म को विदेशी अवधारणा मान कर उसके सम्बन्ध में दुष्प्रचार किया गया और धर्म-भीरु जनता के बीच इसे धर्म-विरोधी सिद्ध किया जाता है.जबकि धर्म के तथा-कथित ठेकेदार खुद ही अधार्मिक हैं परन्तु हमारे कम्यूनिस्ट साथी इस बात को कहते एवं बताते नहीं हैं.नतीजतन जनता गुमराह होती एवं भटकती रहती है तथा अधार्मिक एवं शोषक-उत्पीडक लोग कामयाब हो जाते हैं.आजादी के ६३( अब 2017 में 70 ) वर्ष एवं कम्यूनिस्ट आंदोलन की स्थापना के ८६ (अब 2017 में 92 ) वर्ष बाद भी सही एवं वास्तविक स्थिति जनता के समक्ष न आ सकी है.मैंने अपने  ब्लॉग 'क्रान्तिस्वर' के माध्यम से ढोंग,पाखण्ड एवं अधार्मिकता का पर्दाफ़ाश  करने का अभियान चला रखा है जिस पर आर.एस.एस.से सम्बंधित लोग तीखा प्रहार करते हैं परन्तु एक भी बामपंथी या कम्यूनिस्ट साथी ने उसका समर्थन करना अपना कर्तव्य नहीं समझा है.'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता '  परन्तु कवीन्द्र रवीन्द्र के 'एक्ला चलो रे ' के तहत मैं लगातार लोगों के समक्ष सच्चाई लाने का प्रयास कर रहा हूँ -'दंतेवाडा त्रासदी समाधान क्या है?','क्रांतिकारी राम','रावण-वध एक पूर्व निर्धारित योजना','सीता का विद्रोह','सीता की कूटनीति का कमाल','सर्वे भवन्तु सुखिनः','पं.बंगाल के बंधुओं से एक बे पर की उड़ान','समाजवाद और वैदिक मत','पूजा क्या?क्यों?कैसे?','प्रलय की भविष्यवाणी झूठी है -यह दुनिया अनूठी है' ,समाजवाद और महर्षि कार्लमार्क्स,१८५७ की प्रथम क्रान्ति आदि अनेक लेख मैंने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित अभिमत के अनुसार प्रस्तुत किये हैं जो संतों एवं अनुभवी विद्वानों के वचनों पर आधारित हैं.

मेरा विचार है कि अब समय आ गया है जब भारतीय कम्यूनिस्टों को भारतीय सन्दर्भों के साथ जनता के समक्ष आना चाहिए और बताना चाहिए कि धर्म वह नहीं है जिसमें जनता को उलझा कर उसका शोषण पुख्ता किया जाता है बल्कि वास्तविक धर्म वह है जो वैदिक मतानुसार जीवन-यापन के वही सिद्धांत बताता है जो कम्यूनिज्म का मूलाधार हैं.कविवर नन्द लाल जी यही कहते हैं :-

जिस नर में आत्मिक शक्ति है ,वह शीश झुकाना क्या जाने?
जिस दिल में ईश्वर भक्ति है वह पाप कमाना क्या जाने?
माँ -बाप की सेवा करते हैं ,उनके दुखों को हरते हैं.
वह मथुरा,काशी,हरिद्वार,वृन्दावन जाना क्या जाने?
दो काल करें संध्या व हवन,नित सत्संग में जो जाते हैं.
भगवान् का है विशवास जिन्हें दुःख में घबराना क्या जानें?
जो खेला है तलवारों से और अग्नि के अंगारों से .
रण- भूमि में पीछे जा के वह कदम हटाना क्या जानें?
हो कर्मवीर और धर्मवीर वेदों का पढने वाला हो .
वह निर्बल दुखिया बच्चों पर तलवार चलाना क्या जाने?
मन मंदिर में भगवान् बसा जो उसकी पूजा करता है.
मंदिर के देवता पर जाकर वह फूल चढ़ाना क्या जानें?
जिसका अच्छा आचार नहीं और धर्म से जिसको प्यार नहीं.
जिसका सच्चा व्यवहार नहीं 'नन्दलाल' का गाना क्या जानें?


संत कबीर आदि दयानंद सरस्वती,विवेकानंद आदि महा पुरुषों ने धर्म की विकृतियों तथा पाखंड का जो पर्दाफ़ाश किया है उनका सहारा लेकर भारतीय कम्यूनिस्टों को जनता के समक्ष जाना चाहिए तभी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति और जनता का शोषण समाप्त किया जा सकता है.दरअसल भारतीय वांग्मय में ही कम्यूनिज्म सफल हो सकता है ,यूरोपीय वांग्मय में इसकी विफलता का कारण भी लागू करने की गलत पद्धतियाँ ही थीं.सम्पूर्ण वैदिक मत और हमारे अर्वाचीन पूर्वजों के इतिहास में कम्यूनिस्ट अवधारणा सहजता से देखी जा सकती है -हमें उसी का आश्रय लेना होगा तभी हम सफल हो सकते हैं - भविष्य तो उज्जवल है बस उसे सही ढंग से कहने की जरूरत भर है. 

http://krantiswar.blogspot.in/2011/05/blog-post_14.html


************************************************
Facebook Comments : 

Thursday, 7 September 2017

"बचाओ भारत " - " बदलो भारत '' लाँग मार्च का लखनऊ में स्वागत देख सरकार भयभीत ------ विजय राजबली माथुर








"बचाओ भारत  " - " बदलो भारत '' लाँग मार्च का लखनऊ में स्वागत  :
===================================
लखनऊ , दिनांक 05 सितंबर 2017 को 15 जूलाई से प्रारम्भ लाँग मार्च 53 वें दिवस पर अपरान्ह साढ़े तीन बजे 22, क़ैसर बाग कार्यालय पहुंचा जिसका जोरदार नारों के साथ  अगवानी करके कानपुर, फैजाबाद आदि से आए हुये छात्रों - नौजवानों ने तहे दिल से स्वागत किया। सभा की अध्यक्षता व संचालन यू पी AIYF के अध्यक्ष विनय पाठक ने किया। 
नन्ही बालिका आन्या ने आगंतुक छात्रों - नौजवानों को पुष्प देकर सम्मानित किया उसने जोशपूर्ण शब्दों में ' ज़िंदा हैं तो ........' काव्य पाठ किया एवं ' इंकलाब ज़िंदाबाद ' का आह्वान किया। 
झारखंड से आए छात्र ने ढपली के साथ ओजस्वी गीत ' .... कबीर, रहीम, रसखान चाहिए ....... हिंदुस्तान चाहिए .... इंसान चाहिए ....'  प्रस्तुत कर समां बांध दिया। कुछ स्थानीय छात्रों - नौजवानों ने भी अपना स्वर मिला कर उनका साथ दिया। प्रारम्भ में उन्होने डॉ गिरीश द्वारा प्रदत्त संरक्षक दायित्व के लिए धन्यवाद ज्ञापन भी किया। 
AIYF के महासचिव तापस सिन्हा ने विस्तार से इस लाँग मार्च और इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। तेलंगाना से पधारे छात्र ने हिन्दी में अपना वक्तव्य देकर श्रोताओं को मोंह लिया। AIYF के राष्ट्रीय अध्यक्ष आफताब आलम ने कहा कि, 12 सितंबर को हुसैनीवाला में यात्रा का समापन है लेकिन लेकिन लाँग मार्च अपना उद्देश्य पूरा होने तक चलता रहेगा । उनके द्वारा वरिष्ठों से सहयोग देने की अपेक्षा की गई। 
इस लाँग मार्च की  प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं : 
* सबको रोजगार उपलब्ध कराओ ! ( भगत सिंह राष्ट्रीय रोजगार गारंटी एक्ट लागू करो )
* निशुल्क, अनिवार्य व बिना भेदभाव के वैज्ञानिक शिक्षा उपलब्ध कराओ ! 
* निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करो ! 
* चुनाव सुधार लागू करो ! 
* सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा करो !
* दलितों, मुस्लिम अल्पसंख्यकों, जन जातियों और महिलाओं पर हमले बंद करो !
* धर्म निरपेक्षता की रक्षा करो !
लाँग मार्च के पहुँचने से पूर्व वयोवृद्ध ( 84 वर्षीय )  कामरेड शिव प्रताप तिवारी ने छात्रों - नौजवानों को देश का भविष्य बताते हुये उनके प्रयासों की सराहना की व उनको सफलता हेतु आशीर्वाद दिया। उनके बाद कामरेड विजय माथुर ने 1951 में ' नया जमाना ', सहारनपुर के संस्थापक संपादक कन्हैया लाल मिश्र ' प्रभाकर ' द्वारा आर एस एस प्रचारक लिमये को बताए शब्दों से परिचित कराया कि, शीघ्र ही दिल्ली की सड़कों पर कम्युनिस्टों और आर एस एस के मध्य सत्ता के लिए निर्णायक संघर्ष होगा। सड़कों पर संघर्ष बुजुर्ग और बूढ़े कामरेड्स नहीं कर सकेंगे इसलिए हमें छात्रों - नौजवानों को आशीर्वाद देकर उनका मनोबल बढ़ाना चाहिए। 
इसके बाद कामरेड परमानंद दिवेदी एवं  कई युवा व छात्र भी अपने विचार रखने सामने आए जो ध्यान देने लायक थे। 





Monday, 28 August 2017

तानाशाही की तरफ बढ़ती मोदी की सत्ता को लालू यादव और ममता बनर्जी ही चुनौती दे रहे हैं ------ विजय राजबली माथुर

तानाशाही की तरफ बढ़ती मोदी की सत्ता को लालू यादव और ममता बनर्जी ही चुनौती दे रहे हैं । 
जन भाषा और जन बोली से दूर रहने वाले अति कट्टर साम्यवादी / वामपंथी पटना रैली में CPI के भाग लेने पर आलोचना कर रहे हैं तो कुछ एथीस्ट नेता मनु स्मृति से उदाहरण लेकर बचाव कर रहे हैं। CPM के नेता मनु स्मृति का सहारा लेने की आलोचना कर रहे हैं। 
वास्तविकता तो यह है कि, सभी साम्यवादी / वामपंथी दलों पर ब्राह्मणवादी लोगों का नियंत्रण है और वे अपने कदमों से जाने या अनजाने मोदी के  फासिस्ट कदमों को मजबूती देते जा रहे हैं। 
जब 1952 में संसद ( लोकसभा ) के मुख्य विपक्षी दल की हैसियत में आ गए थे। केरल में चुनाव के जरिये सत्ता हासिल हो चुकी थी तब 'यह आज़ादी झूठी है ' का नारा गढ़ कर पार्टी को विभाजित होते देखा। फिर तो केले के तने की परतों की तरह सैंकड़ा से ऊपर साम्यवादी दल बनते चले गए। ऐसी स्थिति में जनता को जो भी सत्ता - विरोधी विकल्प मिलता रहा उसी के साथ होती चली गई। 
1980 में सत्ता में पुनर्वापिसी के लिए इन्दिरा गांधी ने RSS से जो गुप्त सम्झौता किया और शासन को मजदूर विरोधी दिशा देनी शुरू की उसे राजीव गांधी ने उनकी हत्या के बाद RSS की मदद से ही सत्ता हासिल( तब फिर से RSS ने भाजपा के बजाए इन्दिरा कांग्रेस को समर्थन दिया था और ए बी बाजपेयी को भी हरा दिया था ) करने के कारण कार्पोरेटी स्टाईल में ढालना शुरू किया। 
1991 में वित्तमंत्री बनने के साथ मनमोहन सिंह ने जिस उदारीकरण को अपनाया था उसे एल के आडवाणी साहब न्यूयार्क जाकर अपनी नीतियों को चुराया जाना घोषित कर आए थे। जब उनको तीसरी बार पी एम बनने के आसार नहीं दिखे तब रामदेव,हज़ारे आदि - आदि द्वारा कार्पोरेटी भ्रष्टाचार संरक्षण का आंदोलन खड़ा करवा कर अप्रत्यक्ष रूप से मोदी व भाजपा को इतना मजबूत कर दिया कि, 2014 में उनकी सत्ता आसानी से स्थापित हो गई। 
तानाशाही की तरफ बढ़ती मोदी की सत्ता को लालू यादव और ममता बनर्जी ही चुनौती दे रहे हैं । 
अतः जो साम्यवादी / वामपंथी लालू यादव और ममता बनर्जी से एलर्जी रख कर दूरी बनाना चाहते हैं वे अंततः मोदी की फासिस्ट सत्ता को ही मजबूत बनाने का बहाना ढूंढ रहे हैं। 
CPI ने भी उन D Raja साहब को भेजा जो मूल भाषण अङ्ग्रेज़ी में देते हैं हिन्दी के जानकार और क्षेत्र से वाकिफ अतुल अंजान साहब को नहीं जिससे पता चलता है  कि, सांकेतिक उपस्थिती ही दर्ज करवाई जनता को ठोस संदेश समर्थन का नहीं दिया गया है। 
1951 में 'नया जमाना ', सहारनपुर के संस्थापक संपादक कन्हैया लाल मिश्र ' प्रभाकर ' ने RSS प्रचारक लिमये साहब से कहा था कि, वह दिन दूर नहीं जब दिल्ली की सड़कों पर RSS और कम्युनिस्टों के बीच निर्णायक रक्त - रंजित संघर्ष होगा। 
तब से RSS निरंतर मजबूत हुआ है जबकि  ब्राह्मण वादियों ने कम्युनिस्टों को विभाजित व कमजोर किया है। आज जिस तरह कम्युनिस्ट  खुद जनता से दूर हुये हैं और जन- नेताओं से दूरी बनाए रखने की चर्चा है उसका लाभ उठा कर यदि फासिस्ट सत्ता और मजबूत हुई तब युवा कम्युनिस्ट कार्यकर्ता निश्चय ही RSS से सशस्त्र मुक़ाबला करेगा और तब वह इन ब्राह्मण वादी कम्युनिस्ट नेताओं को भी धकेल कर आगे बढ़ जाएगा। 
यदि आज कम्युनिस्ट नेतृत्व जन तंत्र समर्थकों के साथ किसी एलर्जी के कारण नहीं खड़ा हुआ और फासिस्ट पुनः सत्तारूढ़ हुये  तो भविष्य में होने वाले रक्त - रंजित संघर्ष की ज़िम्मेदारी उन पर भी होगी।




Saturday, 12 August 2017

हिंसा का प्रतिरोध हिंसा से क्यों ? ------ मीनाक्षी देहलवी

यदि सत्ता या समाज की संरचना में हिंसा का तत्व निहित हो तो उसका प्रतिरोध करनेवाली शक्तियों के लिए भी हिंसा या बल प्रयोग एक ऐतिहासिक अनिवार्यता बन जाती है।
Meenakshy Dehlvi
12-08-2017 
समाज में परिवर्तन लाकर उसे बेहतर बनाने के लिए जी जान से जुटे लोगों के रूप में हमें अक्सर समाज में सराहना मिलती है परन्तु हमारे कई मानवतावादी शुभचिन्तक और सहयोगी पूर्वाग्रह के चलते सामाजिक परिवर्तन में हिंसा की जरूरत से कतई सहमत नहीं होते। क्रान्तिकारियों पर यह आरोप बहुधा लगता ही रहा है कि वे हिंसा की अनिवार्यता पर गैरजरूरी जोर देते हैं। विचारवान वामपंथी और प्रगतिशील खेमे की ओर से भी इस प्रश्न पर या तो षडयंत्रकारी चुप्पी रखी जाती है या हिंसा की अनिवार्यता को मौजूदा दौर में अप्रासंगिक बनाने के लिए सिद्धान्त प्रतिपादित किये जाते हैं। स्वयं इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि कोई भी आमूलगामी व्यवस्थागत या आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन हिंसा या बलप्रयोग के बिना संभव नहीं हुआ है। फ्रांसीसी क्रान्ति जैसी पूंजीवादी जनवादी क्रान्तियां या विभिन्न देशों के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष जो पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में सम्पन्न हुए थे, उसमें भी हिंसा या हिंसा का तथ्य मौजूद था। भारत का मुक्ति संघर्ष भी ब्रिटिश शासकों के हृदय परिवर्तन से नहीं बल्कि बल प्रयोग के जरिये हासिल हुआ था। दबाव बनाकर और अहिंसात्मक दिखने वाली सामूहिक कार्रवाइयों की बदौलत यदि शासन करनेवालों को अपने पक्ष में सहमति के लिए बाध्‍य कर दिया जाता है तो वह हिंसा या बलप्रयोग ही होता है। इस रूप में धरना, आन्दोलन, जुलूस, भूख-हड़ताल इन सभी दबाव बनाने वाले तरीकों का गांधी ने राष्‍ट्रीय मुक्ति संघर्ष के दौरान भरपूर इस्तेमाल किया था। गोलमेज जैसी वार्ताओं की पृष्ठभूमि कभी तैयार ही न हो पाती यदि जनता की संगठित कार्रवाइयों के रूप में बलप्रयोग नहीं किया गया होता। यथास्थिति के परिवर्तन में हमेशा ही बलप्रयोग होता रहा है। यह वैज्ञानिक सूत्रीकरण है। और मार्क्सवाद भी एक क्रान्तिकारी सामाजिक परिवर्तन का विज्ञान है, जो शासक वर्ग के संगठित बलप्रयोग के केन्द्रीय उपकरण के रूप में मूर्त राज्यसत्ता के खिलाफ प्रतिरोधी क्रान्तिकारी संगठित हिंसा के राजनीतिक संगठन की अनिवार्यता के सिद्धान्त को सूत्रबद्ध करता है। भारत की पूंजीवादी राज्यसत्ता द्वारा आम जनता के न्यायपूर्ण आन्दोलनों, जायज मांगों को लेकर किये गये प्रदर्शनों धरनों को किस प्रकार पुलिस फौज की लाठी गोली से कुचल दिया जाता है, सैनिकों द्वारा जनसंघर्षों पर बलप्रयोग के लिए किसप्रकार विशेषाधिकार कानून बनाये जाते हैं, यह साफ देखा जा सकता है। यह समझना बहुत कठिन नहीं कि यदि सत्ता या समाज की संरचना में हिंसा का तत्व निहित हो तो उसका प्रतिरोध करनेवाली शक्तियों के लिए भी हिंसा या बल प्रयोग एक ऐतिहासिक अनिवार्यता बन जाती है। परन्तु मार्क्सवादी क्रान्तिकारियों पर हिंसा की अनिवार्यता पर बल देने का आरोप इस प्रकार मढ़ दिया जाता है मानो वे हिंसा को ग्लोारिफाई करना चाहते हों।

साभार: 
https://www.facebook.com/meenakshy.dehlvi/posts/1407080076047643

Facebook Comments : 

Monday, 24 July 2017

समाजवाद की समस्‍याएँ: बीसवीं शताब्‍दी की क्रान्तियों के अनुभव ------ Meenakshy Dehlvi


 क्रान्तियों की कार्बन कॉपी या नकल नहीं होती। आज दुनिया की परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं। आज के युग की क्रांतियाँ चीन की नवजनवादी क्रांति जैसी या हूबहू अक्टूबर क्रान्ति जैसी नहीं हो सकतीं। आज केवल देशी पूँजीवाद के विरुद्ध नहीं बल्कि साम्राज्यवाद और पूँजीवाद विरोधी क्रांतियां होंगी। पूँजीवाद आर्थिक रूप से संकटग्रस्‍त है लेकिन इसकी राज्यसत्ता तथा इसके सामाजिक अवलम्ब आज पहले से कहीं ज्यादा मज़बूत और गहरे जड़ जमाये हुए हैं। इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रांतियों को अंजाम देने के लिए आज मुक्त चिंतन और कठमुल्लावाद से बचते हुए मार्क्सवाद को रचनात्‍मक ढंग से अपने देश की परिस्थितियों में लागू करना होगा।
Meenakshy Dehlvi shared October Revolution Centenary Committee's post
24-07-2017

समाजवाद की समस्‍याएँ: बीसवीं शताब्‍दी की क्रान्तियों के अनुभव' पर व्‍याख्‍यान की प्रेस विज्ञप्ति और कुछ तस्‍वीरें

लखनऊ, 23 जुलाई। आज पूँजीवाद और साम्राज्‍यवाद पूरे विश्‍व में आक्रामक हैं लेकिन जगह-जगह इनके प्रतिरोध के आन्‍दोलन ज़ोर पकड़ रहे हैं जिन्‍हें सही दिशा की तलाश है। आने वाला समय पूँजीवाद-साम्राज्‍यवाद विरोधी नयी समाजवादी क्रान्तियों का होगा। मार्क्‍सवादी चिन्‍तक और ऐक्टिविस्‍ट शशि प्रकाश ने आज यहाँ 'समाजवाद की समस्‍याएँ: बीसवीं शताब्‍दी की क्रान्तियों के अनुभव' विषय पर अपने व्‍याख्‍यान में ये बाते कहीं।

'अक्‍टूबर क्रान्ति शतवार्षिकी समिति' और 'अरविन्‍द स्‍मृति न्‍यास' की ओर से जयशंकर प्रसाद सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्‍यक्षता गिरि विकास अध्‍ययन संस्‍थान के निदेशक प्रो. सुरिन्‍दर कुमार को करनी थी लेकिन अचानक अस्‍वस्‍थ हो जाने के कारण वे आज आ नहीं सके। व्‍याख्‍यान के बाद इस विषय के विभिन्‍न पहलुओं पर सवाल-जवाब का भी दौर चला।

शशि प्रकाश ने कहा कि 1917 में हुई अक्टूबर क्रान्ति ने बीसवीं सदी को एक नयी शक्ल दी। पूरी दुनिया में शोषण और अन्‍याय के विरुद्ध संघर्ष को इसने प्रेरणा और दिशा दी। भारत में 1917 से 1930 के बीच हिन्‍दी और अन्‍य भाषाओं की पत्रिकाओं में लेनिन और सोवियत क्रान्ति, सोवियत संघ में स्त्रियों की स्थिति, कृषि के सामूहिकीकरण, पंचवर्षीय योजनाओं आदि के बारे में सैकड़ों लेख, कविताएँ आदि छपे। भगत सिंह और उनके साथियों ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन नाम रखते हुए मार्क्सवादी सिद्धान्तों पर सर्वहारा वर्ग की पार्टी बनाने की घोषणा की।

उन्‍होंने कहा कि अक्‍टूबर क्रान्ति के बाद पहली बार ऐसी राजसत्‍ता कायम हुई जिसमें निजी स्‍वामित्‍व की व्‍यवस्‍था पर चोट की। उत्‍पादन के साधनों का समाजीकरण किया गया और कुछ ही वर्षों में करोड़ों लोगों के जीवनस्‍तर को कई गुना ऊपर उठाया गया। 1918 की विवाह और परिवार संहिता में पहली बार स्त्रियों को बराबर के अधिकार दिए गए। जीवन के हर क्षेत्र में उन्‍हें न केवल काम करने का अधिकार दिया गया बल्कि चूल्हे चौखट से उन्‍हें मुक्त करने के लिए सामूहिक भोजनालयों से लेकर बड़े स्तर पर शिशु शालाओं का निर्माण भी किया गया। वेश्यावृति, नशाखोरी, बेरोज़गारी, भीख आदि क्रान्ति के कुछ वर्षों बाद समाज से समाप्‍त हो गये। अक्टूबर क्रान्ति केवल 500 वर्ष के पूँजीवाद के विरुद्ध क्रान्ति नहीं थी, वह 5000 वर्षों के पूरे वर्ग समाज के विरुद्ध एक सतत क्रान्ति की शुरआत का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी।

समाजवाद की समस्‍याओं की चर्चा करते हुए शशि प्रकाश ने कहा कि हर मौलिक क्रान्ति की तरह इस पहली समाजवादी क्रान्ति की भी कुछ समस्‍याएँ थीं। क्रान्ति के बाद निजी मालिकाने का काफी हद खात्मा तो हो गया लेकिन समाज में मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के बीच, कृषि और उद्योग के बीच, शहर और गाँव के बीच के अन्तर जैसी असमानताएँ बनी हुई थीं। मूल्‍य का नियम और मज़दूरी की व्‍यवस्‍था बने हुए थे। लोगों की सोच, संस्‍कार और आदतों में पूँजीवादी मूल्‍य-मान्‍यताएँ रातों-रात नहीं खत्‍म होते। निश्‍चय ही मार्क्‍सवाद के सिद्धान्‍तों पर अमल में व्‍यावहारिक ग़लतियाँ भी हुईं। पूँजीवाद की पुनर्स्थापना का प्रयास करने वाले तत्‍वों को इस ज़मीन पर अपनी ताक़त बढ़ाने का अवसर मिला और 1956 में सोवियत संघ में समाजवाद के लेबल के तहत पूँजीवाद की बहाली हो गयी तथा 1989 में लेबल भी हटाकर खुला पूँजीवाद आ गया।

उन्‍होंने कहा कि चीन में 1949 में होने वाली नवजनवादी क्रान्ति के बाद वहाँ इन समस्याओं पर लम्‍बा वाद-विवाद चला और 1966-67 में शुरू हुई सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के द्वारा पूँजीवाद की वापसी रोकने का एक रास्‍ता प्रस्‍तुत किया गया। इसमें कहा गया कि समाजवादी व्‍यवस्‍था कायम होने के बाद ऊपरी संरचना में सतत क्रान्ति जारी रखनी होगी और एक नया मानव बनाने का काम सर्वोपरि हो जायेगा। हालाँकि उस समय चीन में भी वर्ग शक्ति संतुलन पूँजीवादी पथगामियों के पक्ष में झुक गया था और 1976 के बाद से वहाँ भी बाजार समाजवाद के नाम पर पूँजीवाद की पुनर्स्थापना की शुरुआत हो चुकी थी।

आज के समय की चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि क्रान्तियों की कार्बन कॉपी या नकल नहीं होती। आज दुनिया की परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं। आज के युग की क्रांतियाँ चीन की नवजनवादी क्रांति जैसी या हूबहू अक्टूबर क्रान्ति जैसी नहीं हो सकतीं। आज केवल देशी पूँजीवाद के विरुद्ध नहीं बल्कि साम्राज्यवाद और पूँजीवाद विरोधी क्रांतियां होंगी। पूँजीवाद आर्थिक रूप से संकटग्रस्‍त है लेकिन इसकी राज्यसत्ता तथा इसके सामाजिक अवलम्ब आज पहले से कहीं ज्यादा मज़बूत और गहरे जड़ जमाये हुए हैं। इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रांतियों को अंजाम देने के लिए आज मुक्त चिंतन और कठमुल्लावाद से बचते हुए मार्क्सवाद को रचनात्‍मक ढंग से अपने देश की परिस्थितियों में लागू करना होगा।

कार्यक्रम में शहर के अनेक गणमान्‍य लेखक, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता शोधार्थी और छात्र-युवा उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन सत्‍यम ने किया।
https://www.facebook.com/octoberrevolution/posts/840658872767821