Sunday 15 February 2015

उदारीकरण और निजीकरण की तेज होती नीतियों में क्रिकेट प्रमुख व्यवसाय बन गया ---आयुष ढाका



***साभार : Aayush Dhaka ·  :

https://www.facebook.com/aayush.db.9/posts/1567383253507860


क्रिकेट को दीवानगी की तरह, जूनून की तरह और उत्तेजक राष्टवाद के क्रत्रिम भावो की तरह प्रस्तुत करना पूंजीवादी सत्ता और मिडिया का चरित्र हैं। वरन अपने पूर्ववर्त्ती औपनिवेशिक देशों में इंग्लेंड इस खेल को बिना निजी स्वार्थ के आगे नही बढ़ाता । इसमे तड़का तो खंडित आजादी के बाद देशी पूंजीपति वर्ग ने अपने हितो की आकंठ पूर्ति हेतु लगाया और बड़े मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग और निम्न वर्ग में क्रिकेट को रेडियो, टीवी और अख़बार के प्रथम पन्नो पर और मुख्य खबरों में शामिल कर जनमानस में चस्पा कर दिया। दूसरी और भारत में इसी दौर में पनप रही हिन्दू फासिस्ट ताकतों ने इसे कथित राष्ट्रप्रेम की भावनाओ से जोड़कर अल्पसंख्यक विरोधी अवधारणा को युवाओ के बीच मजबूत किया । ताकि साझा एकता की दरार और चौड़ी हो। इन सबके बीच मूल रूप से क्रिकेट खेल रहे खिलाड़ी को अपनी बढ़ती सेलिब्रिटी साख से इस कदर मोह हो जाता है कि उसे जिन्दगी में कभी भी आमजन की किसी भी पीड़ा से, तकलीफों से, बेरोजगारी से कोई सरोकार नही रहता हैं ( ये वो ही जनता होती हैं जो इनका नाम रात दिन लेती रहती है) दरअसल मे देशीे विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रोडक्ट को विज्ञापनों में मार्केटिंग कर ये खिलाड़ी सच्चे मायने में इन धनी पूंजीपतियों के गुलाम मोहरे के रूप में काम करते है एवम जिन्दगी भर जूते, कपड़े,पेप्सी कोला और न जाने क्या क्या बेचते रहते हैं और कम्पनियों की कमाई अपनी जन साख से बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते है । और रिटायर होने पर ( अपने पैसे को ऐसी जगह निवेश करते है जहाँ टैक्स पर छुट हो) कोच, मैनेजर, अम्पायर, कमेन्टटेटर बनकर या क्रिकेट अकादमी खोलकर अपनी निजी पूंजी को आगे बढ़ाते रहते है या फिर पूंजीवादी पार्टियों की धूर्त राजनीती में शामिल होकर दुमछ्ले राजनीतिग्य बनकर अपना पूर्व इल्म और शोखी बघारते रहते है। उदारीकरण और निजीकरण की तेज होती नीतियों में क्रिकेट प्रमुख व्यवसाय बन गया और क्रिकेटर नीलामी लगे बिके हुए घोड़े ( इसमे इनको कोई दिक्कत नही) बनकर मनोरंजन के नाम पर युवाओ के दिलो दिमाग में वैचारिक दिवालियापन भरते गये। आलम तो ये हुआ कि जो पूंजीवादी राज्य सत्ता महिला आजादी और बराबरी की बाते करता है इसी पूंजीवादी समाज ने ,पिछड़ी मध्यकालिन सामन्ती संस्क्रति की तरह महिलाओ को क्रिकेट के खुले मैदानी कोठे में चीयर लीडर्स के रूप में फूहड़ता से नचाना शुरू कर दिया । इन सबका नतीजा क्या हुआ , हम अधूरी आजादी के दौर में भी अपनी असली समस्या को भूल क्रिकेटी नशे से चिपके रहे लेकिन इस अंध जूनून से असली समस्या का निवारण नही होता है । और पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा रोपित कि गई हमारी अज्ञानता का प्रदर्शन और भौंडा होता जा रहा है । जिसमे इसी व्यवस्था की सहूलियत हैं । -आयुष ढाका

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