Saturday, 12 August 2017

हिंसा का प्रतिरोध हिंसा से क्यों ? ------ मीनाक्षी देहलवी

यदि सत्ता या समाज की संरचना में हिंसा का तत्व निहित हो तो उसका प्रतिरोध करनेवाली शक्तियों के लिए भी हिंसा या बल प्रयोग एक ऐतिहासिक अनिवार्यता बन जाती है।
Meenakshy Dehlvi
12-08-2017 
समाज में परिवर्तन लाकर उसे बेहतर बनाने के लिए जी जान से जुटे लोगों के रूप में हमें अक्सर समाज में सराहना मिलती है परन्तु हमारे कई मानवतावादी शुभचिन्तक और सहयोगी पूर्वाग्रह के चलते सामाजिक परिवर्तन में हिंसा की जरूरत से कतई सहमत नहीं होते। क्रान्तिकारियों पर यह आरोप बहुधा लगता ही रहा है कि वे हिंसा की अनिवार्यता पर गैरजरूरी जोर देते हैं। विचारवान वामपंथी और प्रगतिशील खेमे की ओर से भी इस प्रश्न पर या तो षडयंत्रकारी चुप्पी रखी जाती है या हिंसा की अनिवार्यता को मौजूदा दौर में अप्रासंगिक बनाने के लिए सिद्धान्त प्रतिपादित किये जाते हैं। स्वयं इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि कोई भी आमूलगामी व्यवस्थागत या आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन हिंसा या बलप्रयोग के बिना संभव नहीं हुआ है। फ्रांसीसी क्रान्ति जैसी पूंजीवादी जनवादी क्रान्तियां या विभिन्न देशों के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष जो पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में सम्पन्न हुए थे, उसमें भी हिंसा या हिंसा का तथ्य मौजूद था। भारत का मुक्ति संघर्ष भी ब्रिटिश शासकों के हृदय परिवर्तन से नहीं बल्कि बल प्रयोग के जरिये हासिल हुआ था। दबाव बनाकर और अहिंसात्मक दिखने वाली सामूहिक कार्रवाइयों की बदौलत यदि शासन करनेवालों को अपने पक्ष में सहमति के लिए बाध्‍य कर दिया जाता है तो वह हिंसा या बलप्रयोग ही होता है। इस रूप में धरना, आन्दोलन, जुलूस, भूख-हड़ताल इन सभी दबाव बनाने वाले तरीकों का गांधी ने राष्‍ट्रीय मुक्ति संघर्ष के दौरान भरपूर इस्तेमाल किया था। गोलमेज जैसी वार्ताओं की पृष्ठभूमि कभी तैयार ही न हो पाती यदि जनता की संगठित कार्रवाइयों के रूप में बलप्रयोग नहीं किया गया होता। यथास्थिति के परिवर्तन में हमेशा ही बलप्रयोग होता रहा है। यह वैज्ञानिक सूत्रीकरण है। और मार्क्सवाद भी एक क्रान्तिकारी सामाजिक परिवर्तन का विज्ञान है, जो शासक वर्ग के संगठित बलप्रयोग के केन्द्रीय उपकरण के रूप में मूर्त राज्यसत्ता के खिलाफ प्रतिरोधी क्रान्तिकारी संगठित हिंसा के राजनीतिक संगठन की अनिवार्यता के सिद्धान्त को सूत्रबद्ध करता है। भारत की पूंजीवादी राज्यसत्ता द्वारा आम जनता के न्यायपूर्ण आन्दोलनों, जायज मांगों को लेकर किये गये प्रदर्शनों धरनों को किस प्रकार पुलिस फौज की लाठी गोली से कुचल दिया जाता है, सैनिकों द्वारा जनसंघर्षों पर बलप्रयोग के लिए किसप्रकार विशेषाधिकार कानून बनाये जाते हैं, यह साफ देखा जा सकता है। यह समझना बहुत कठिन नहीं कि यदि सत्ता या समाज की संरचना में हिंसा का तत्व निहित हो तो उसका प्रतिरोध करनेवाली शक्तियों के लिए भी हिंसा या बल प्रयोग एक ऐतिहासिक अनिवार्यता बन जाती है। परन्तु मार्क्सवादी क्रान्तिकारियों पर हिंसा की अनिवार्यता पर बल देने का आरोप इस प्रकार मढ़ दिया जाता है मानो वे हिंसा को ग्लोारिफाई करना चाहते हों।

साभार: 
https://www.facebook.com/meenakshy.dehlvi/posts/1407080076047643

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Monday, 24 July 2017

समाजवाद की समस्‍याएँ: बीसवीं शताब्‍दी की क्रान्तियों के अनुभव ------ Meenakshy Dehlvi


 क्रान्तियों की कार्बन कॉपी या नकल नहीं होती। आज दुनिया की परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं। आज के युग की क्रांतियाँ चीन की नवजनवादी क्रांति जैसी या हूबहू अक्टूबर क्रान्ति जैसी नहीं हो सकतीं। आज केवल देशी पूँजीवाद के विरुद्ध नहीं बल्कि साम्राज्यवाद और पूँजीवाद विरोधी क्रांतियां होंगी। पूँजीवाद आर्थिक रूप से संकटग्रस्‍त है लेकिन इसकी राज्यसत्ता तथा इसके सामाजिक अवलम्ब आज पहले से कहीं ज्यादा मज़बूत और गहरे जड़ जमाये हुए हैं। इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रांतियों को अंजाम देने के लिए आज मुक्त चिंतन और कठमुल्लावाद से बचते हुए मार्क्सवाद को रचनात्‍मक ढंग से अपने देश की परिस्थितियों में लागू करना होगा।
Meenakshy Dehlvi shared October Revolution Centenary Committee's post
24-07-2017

समाजवाद की समस्‍याएँ: बीसवीं शताब्‍दी की क्रान्तियों के अनुभव' पर व्‍याख्‍यान की प्रेस विज्ञप्ति और कुछ तस्‍वीरें

लखनऊ, 23 जुलाई। आज पूँजीवाद और साम्राज्‍यवाद पूरे विश्‍व में आक्रामक हैं लेकिन जगह-जगह इनके प्रतिरोध के आन्‍दोलन ज़ोर पकड़ रहे हैं जिन्‍हें सही दिशा की तलाश है। आने वाला समय पूँजीवाद-साम्राज्‍यवाद विरोधी नयी समाजवादी क्रान्तियों का होगा। मार्क्‍सवादी चिन्‍तक और ऐक्टिविस्‍ट शशि प्रकाश ने आज यहाँ 'समाजवाद की समस्‍याएँ: बीसवीं शताब्‍दी की क्रान्तियों के अनुभव' विषय पर अपने व्‍याख्‍यान में ये बाते कहीं।

'अक्‍टूबर क्रान्ति शतवार्षिकी समिति' और 'अरविन्‍द स्‍मृति न्‍यास' की ओर से जयशंकर प्रसाद सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्‍यक्षता गिरि विकास अध्‍ययन संस्‍थान के निदेशक प्रो. सुरिन्‍दर कुमार को करनी थी लेकिन अचानक अस्‍वस्‍थ हो जाने के कारण वे आज आ नहीं सके। व्‍याख्‍यान के बाद इस विषय के विभिन्‍न पहलुओं पर सवाल-जवाब का भी दौर चला।

शशि प्रकाश ने कहा कि 1917 में हुई अक्टूबर क्रान्ति ने बीसवीं सदी को एक नयी शक्ल दी। पूरी दुनिया में शोषण और अन्‍याय के विरुद्ध संघर्ष को इसने प्रेरणा और दिशा दी। भारत में 1917 से 1930 के बीच हिन्‍दी और अन्‍य भाषाओं की पत्रिकाओं में लेनिन और सोवियत क्रान्ति, सोवियत संघ में स्त्रियों की स्थिति, कृषि के सामूहिकीकरण, पंचवर्षीय योजनाओं आदि के बारे में सैकड़ों लेख, कविताएँ आदि छपे। भगत सिंह और उनके साथियों ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन नाम रखते हुए मार्क्सवादी सिद्धान्तों पर सर्वहारा वर्ग की पार्टी बनाने की घोषणा की।

उन्‍होंने कहा कि अक्‍टूबर क्रान्ति के बाद पहली बार ऐसी राजसत्‍ता कायम हुई जिसमें निजी स्‍वामित्‍व की व्‍यवस्‍था पर चोट की। उत्‍पादन के साधनों का समाजीकरण किया गया और कुछ ही वर्षों में करोड़ों लोगों के जीवनस्‍तर को कई गुना ऊपर उठाया गया। 1918 की विवाह और परिवार संहिता में पहली बार स्त्रियों को बराबर के अधिकार दिए गए। जीवन के हर क्षेत्र में उन्‍हें न केवल काम करने का अधिकार दिया गया बल्कि चूल्हे चौखट से उन्‍हें मुक्त करने के लिए सामूहिक भोजनालयों से लेकर बड़े स्तर पर शिशु शालाओं का निर्माण भी किया गया। वेश्यावृति, नशाखोरी, बेरोज़गारी, भीख आदि क्रान्ति के कुछ वर्षों बाद समाज से समाप्‍त हो गये। अक्टूबर क्रान्ति केवल 500 वर्ष के पूँजीवाद के विरुद्ध क्रान्ति नहीं थी, वह 5000 वर्षों के पूरे वर्ग समाज के विरुद्ध एक सतत क्रान्ति की शुरआत का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी।

समाजवाद की समस्‍याओं की चर्चा करते हुए शशि प्रकाश ने कहा कि हर मौलिक क्रान्ति की तरह इस पहली समाजवादी क्रान्ति की भी कुछ समस्‍याएँ थीं। क्रान्ति के बाद निजी मालिकाने का काफी हद खात्मा तो हो गया लेकिन समाज में मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के बीच, कृषि और उद्योग के बीच, शहर और गाँव के बीच के अन्तर जैसी असमानताएँ बनी हुई थीं। मूल्‍य का नियम और मज़दूरी की व्‍यवस्‍था बने हुए थे। लोगों की सोच, संस्‍कार और आदतों में पूँजीवादी मूल्‍य-मान्‍यताएँ रातों-रात नहीं खत्‍म होते। निश्‍चय ही मार्क्‍सवाद के सिद्धान्‍तों पर अमल में व्‍यावहारिक ग़लतियाँ भी हुईं। पूँजीवाद की पुनर्स्थापना का प्रयास करने वाले तत्‍वों को इस ज़मीन पर अपनी ताक़त बढ़ाने का अवसर मिला और 1956 में सोवियत संघ में समाजवाद के लेबल के तहत पूँजीवाद की बहाली हो गयी तथा 1989 में लेबल भी हटाकर खुला पूँजीवाद आ गया।

उन्‍होंने कहा कि चीन में 1949 में होने वाली नवजनवादी क्रान्ति के बाद वहाँ इन समस्याओं पर लम्‍बा वाद-विवाद चला और 1966-67 में शुरू हुई सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के द्वारा पूँजीवाद की वापसी रोकने का एक रास्‍ता प्रस्‍तुत किया गया। इसमें कहा गया कि समाजवादी व्‍यवस्‍था कायम होने के बाद ऊपरी संरचना में सतत क्रान्ति जारी रखनी होगी और एक नया मानव बनाने का काम सर्वोपरि हो जायेगा। हालाँकि उस समय चीन में भी वर्ग शक्ति संतुलन पूँजीवादी पथगामियों के पक्ष में झुक गया था और 1976 के बाद से वहाँ भी बाजार समाजवाद के नाम पर पूँजीवाद की पुनर्स्थापना की शुरुआत हो चुकी थी।

आज के समय की चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि क्रान्तियों की कार्बन कॉपी या नकल नहीं होती। आज दुनिया की परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं। आज के युग की क्रांतियाँ चीन की नवजनवादी क्रांति जैसी या हूबहू अक्टूबर क्रान्ति जैसी नहीं हो सकतीं। आज केवल देशी पूँजीवाद के विरुद्ध नहीं बल्कि साम्राज्यवाद और पूँजीवाद विरोधी क्रांतियां होंगी। पूँजीवाद आर्थिक रूप से संकटग्रस्‍त है लेकिन इसकी राज्यसत्ता तथा इसके सामाजिक अवलम्ब आज पहले से कहीं ज्यादा मज़बूत और गहरे जड़ जमाये हुए हैं। इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रांतियों को अंजाम देने के लिए आज मुक्त चिंतन और कठमुल्लावाद से बचते हुए मार्क्सवाद को रचनात्‍मक ढंग से अपने देश की परिस्थितियों में लागू करना होगा।

कार्यक्रम में शहर के अनेक गणमान्‍य लेखक, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता शोधार्थी और छात्र-युवा उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन सत्‍यम ने किया।
https://www.facebook.com/octoberrevolution/posts/840658872767821

Friday, 14 July 2017

समाजवादियों की शक्ति से ओतप्रोत काँग्रेस और एकीकृत वामपंथी दल का साझा मोर्चा वक्त की ज़रुरत ------ पंकज श्रीवास्तव

संसदीय रास्ते पर चल रहीं बाक़ी कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता समय की स्वाभाविक माँग है !






Pankaj Srivastava
13-07-2017 at 5:56pm
बात बरख़ास्त-3
काँग्रेस+समाजवादी+वामपंथी- रामचंद्र गुहा की 'फैंटेसी' में छिपा भविष्य का रास्ता !
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के नीम अंधेर कमरे में पहली बार यह शब्द-पद कान में पड़ा था- अमूर्त प्रत्यय !
वह बीए प्रथम वर्ष की कोई शुरुआती कक्षा थी। विज्ञान के विषयों से इंटरमीडिएट करके आने वाले मेरे जैसे छात्र के लिए इसका ठीक अर्थ समझने में कई साल लग गए। और जब थोड़ा- बहुत समझ आया तो पाया कि यह अपने किसी काम का नहीं है। बदलाव के लिए अमूर्त नहीं, ठोस समझ और कार्रवाइयों की ज़रूरत होती है।
एनडीटीवी पर कल शाम इतिहासकार रामचंद्र गुहा से सुनी उनकी 'फैंटेसी' दिमाग़ में घर कर गई है। गुहा ने मौजूदा राजनीतिक हालात के मद्देनज़र सलाह दी कि नेता विहीन काँग्रेस और पार्टी विहीन नीतीश कुमार को साथ आ जाना चाहिए (ज़ाहिर है, राहुल गाँधी के बारे में उनकी राय अच्छी नहीं है।)
हाँलाकि गुहा ने इसे अपनी 'फैंटेसी' बताकर साफ़ कर दिया कि इस संभावना के हक़ीक़त में बदलने की कोई उम्मीद उन्हें भी नहीं है, लेकिन फिर भी इस टिप्पणी के ज़रिए एक गंभीर सूत्र तो वे दे ही गए। राष्ट्रीय परिदृश्य पर नज़र डालें तो कभी ग़ैरकाँग्रेसवाद के पुरोधा रहे तमाम समाजवादियों और काँग्रेस के बीच कोई वैचारिक अंतर नहीं रह गया है। ऐसे में अगर देश सचमुच फ़ासीवादी ख़तरे के मुहाने पर है (या उसमें फँस गया है) तो फिर समाजवादियों की काँग्रेस में वापसी में हर्ज़ ही क्या है।
कभी काँग्रेस समाजवादी पार्टी (सीएसपी) काँग्रेस के अंदर ही समाजवादियों का मंच था। डॉ.लोहिया, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव जैसे दिग्गज इसी के ज़रिए काँग्रेस को समाजवादी रंग में रँगना चाहते थे। नेहरू और सुभाषचंद्र बोस काँग्रेस ही नहीं, समाजवादी नेता बतौर भी दुनिया भर में जाने गए थे। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के 1931 के कराची अधिवेशन में 'समाजवादी ढर्रे के विकास' को भविष्य के भारत का लक्ष्य घोषित किया था।
लेकिन काँग्रेस के अंदर मौजूद दक्षिणपंथियों के दबाव की वजह से तमाम समाजवादियों ने 1948 में काँग्रेस छोड़ दी (यह दोहरी सदस्यता पर सवाल का पहला मामला था)। लेकिन समाजवादियों का दबाव ही था कि 1955 में काँग्रेस के अवाडी अधिवेशन में देश को समाजवादी ढर्रे पर ले जाने का प्रस्ताव फिर पारित हुआ जिसे बाद में भारतीय संसद ने नीति के बतौर स्वीकार किया।
बहरहाल, काँग्रेस के हाहाहूती प्रभाव के दौर में समाजवादियों ने एक प्रतिपक्ष गढ़ने की ज़रूरी कोशिश की लेकिन इसके ज़रिए गाँधी के हत्यारों के रूप में चिन्हित राजनीतिक धारा को भी पैर ज़माने का मौक़ा मिल गया। आज उस धारा से बहकर आया ज़हर, तमाम विविधिताओं को गूँथकर एक राष्ट्र बनाने की 'हिंदुस्तान' नाम की अनोखी परियोजना की हत्या पर उतारू है।
काँग्रेस बिहार में नीतीश कुमार की सरकार में शामिल है। समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ चुकी है। ऐसे में मौजूदा फ़ासीवादी ख़तरे को देखते हुए अगर तमाम समाजवादी काँग्रेस में लौट आएँ तो यह कोई फैंटेसी नहीं है, इतिहास से सबक लेना भी होगा । अतीत में फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ ऐसी मोर्चेबंदी हो चुकी है।
यही बात वामपंथियों पर भी लागू होती है। ज़ाहिर है, वे कम्युनिस्ट पार्टियाँ काँग्रेस के समानांतर आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय रहीं और वर्गीय प्रश्न को केंद्रीय बनाने का प्रयास करती रही, काँग्रेस से उनका वैसा रिश्ता नहीं रहा जैसा समाजवादियों का था। क्रांति की लाइन या भारतीय समाज की समझ को लेकर उनमें कई विभाजन हुए, लेकिन आज उनके एक ना हो पाने की कोई वजह नहीं रह गई है। अगर माओवादियों को छोड़ दें (जो आज भी हथियारबंद गुरिल्ला युद्ध के ज़रिए दिल्ली पर कब्ज़ा करने का अर्थहीन सपना देख रहे हैं और बचे-खुचे सघनवन क्षेत्रों में सिमटे हैं) तो संसदीय रास्ते पर चल रहीं बाक़ी कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता समय की स्वाभाविक माँग है !
इस बात में कोई संदेह नहीं कि समाजवादियों की शक्ति से ओतप्रोत काँग्रेस और एकीकृत वामपंथी दल का साझा मोर्चा मोदी-शाह चुनौती से निपटने का कारगर फार्मूला हो सकता है।
यह सिर्फ़ चुनावी चुनौती से निपटने का मामला नहीं है..साँप्रदायिक फुफकार से धरती को बंजर करने वालों के ख़िलाफ़ 'सद्भाव की नहरें खोदने का राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करना होगा।
आर्थिक नीतियाँ...? प्रश्न महत्वपूर्ण है, लेकिन किसके पास कोई वैकल्पिक मॉडल है ? पूँजीनिवेश का रास्ता खोलने वाली काँग्रेस, उसी पर एक्सप्रेस वे बनाने वाले समाजवादी और टाटा के लिए गोली चलवा बैठे वामपंथियों के पास कौन सा वैकल्पिक मॉडल है, देश जानना चाहता है !
स्वदेशी के नारे को दफ़ना कर कॉरपोरेट के दुलरुआ बनने वाले संघियों के पास ही कौन सा वैकल्पिक मॉडल है ?
लेकिन आर्थिक नीतियों के लगभग समान होने के बावजूद तीन साल के अंदर हम जान गए हैं कि काँग्रेस और बीजेपी एक नहीं है। दोनों एक हैं- इस पर अकादमिक पर्चे लिखे जा सकते हैं, लेकिन गली-गली शिकार हो रहे अल्पसंख्यक समुदाय के बेगुनाह लोगों की जान नहीं बचाई जा सकती।
इतिहास में कुछ ऐसे दौर आते हैं जब पुरानी मान्यताओं से चिपके रहने या पोलिटकिली करेक्ट होने की मजबूरी से बाहर आकर वह बोलना ज़रूरी हो जाता है, जो महसूस होता है। इस बात का कोई मतलब नहीं कि चुनाव में पर्चे छपवाकर कहा जाए कि देश बचाने के लिए किसको हराना ज़रूरी है। किसे जिताया जाए--अगर यह बता पाने का सामर्थ्य नहीं है तो फिर राजनीति में दिमाग़ लगाना बंद कर देना चाहिए।
'भारत' नाम की अनोखी और मानव सभ्यता को नई ऊँचाई पर ले जाने वाली 'परियोजना' को बचाने और सँवारने के लिए युद्ध अवश्यम्भावी हो गया है जिसके लिए संयुक्त मोर्चा ज़रूरी है।
हैरान ना हों कॉमरेड... मुझे पता है कि आप भी मन ही मन काँग्रेस या बीजेपी विरोधी दलों की जीत पर ख़ुश होते हैं। मैं भी पागल नहीं हूँ..बस मुझे 'अमूर्त प्रत्यय' आज भी समझ नहीं आता है।
https://www.facebook.com/pankaj.srivastava.1023/posts/1475440085851213

Monday, 10 July 2017

हमारी आपसी एकता पर नफरत की राजनीति का हमला ------ प्रो . उमा राग



Uma Raag
*_नफरत और हिंसा से नाता तोड़ो – इंसानियत और एकता से रिश्ता जोड़ो !!_*
*_देश के संविधान के साथ जन-संकल्प अभियान !!_*
(दिल्ली के विभिन्न इलाकों में 15 जुलाई से 15 अगस्त तक)
*_आंदोलनकारी मज़दूरों-किसानों और छात्रों-नौजवानों का साथ दो!_*
*_फूट डालो और राज करो की राजनीति को ख़त्म करो !_*
आज देश में हालत ये है कि एक तरफ सरकार अडानी-अम्बानी को टैक्स और क़र्ज़ माफ़ कर रही है, दूसरी तरफ हर दिन किसान क़र्ज़ में लदकर आत्महत्या कर रहे हैं, क़र्ज़ माफ़ी मांग रहे किसानों पर सरकार गोलियां चला रही है; मजदूरों के हक-अधिकार उनसे छीने जा रहे हैं, न्यूनतम मजदूरी पूरे देश में कही भी ढंग से लागू नहीं है. चारों तरफ महंगे स्कूलों की मार है, देश के अच्छे व सस्ते विश्वविद्यालयों पर हमला जारी है, छात्रों का वजीफा बंद किया जा रहा है व उच्च शिक्षा से बेदखली जारी है. GST ने महंगाई की मार को और तेज़ कर दिया है. एक तरफ पूरे देश में बेरोजगारी तेज़ी से बढ़ी है, दूसरी तरफ पक्की नौकरियां ख़त्म की जा रही है.
लेकिन सत्ता में बैठी सरकार को शिक्षा-रोज़गार के सवालों पर, किसानों और मज़दूरों के अधिकारों के लिए, महंगाई और GST के खिलाफ उभरते जन आंदोलनों से डर लगता है. इन आंदोलनों को तोड़ने की मंशा से शासक शक्तियां उसी 'फूट डालो और राज करो' के हथकंडे का इस्तेमाल कर रही हैं जिन्हें आज़ादी के आंदोलन के खिलाफ अंग्रेज़ शासकों ने किया था. हम किस धर्म को मानते हैं; क्या पर्व मनाते हैं; कैसे कपड़े पहनते हैं; क्या खाते हैं; किनसे शादी करते हैं - इन सब बातों में नफ़रत घोला जा रहा है. नफरत का ये कारोबार सत्ता में बैठे नेता और सरकार सिर्फ अपनी नाकामी और वादाखिलाफी को छुपाने के लिए कर रहे हैं.
हमारे देश और समाज में नफरत और हिंसा का माहौल बढ़ रहा है। कई तरह की अफवाहों को फैलाकर उन्मादी भीड़ की हिंसा को अंजाम दिया जा रहा है। इस तरह की उन्मादी भीड़ की हिंसा का शिकार हमारे देश के कमज़ोर तबकों के आम नागरिक हो रहे हैं और समाज के भीतर धार्मिक व जातीय नफ़रत की खाई बढ़ रही है।
गौरतलब है कि इन हिंसाओं में जिनकी जाने जा रही हैं वो भी आम नागरिक है और इन हिंसाओं को अंजाम देने के लिए जिन लोगों को भड़काया जा रहा है, जिनके अन्दर नफरत भरी जा रही है वे भी आम नागरिक हैं।
हाल में दिल्ली के नज़दीक, बल्लभगढ़ में 15 वर्षीय जुनैद की ट्रेन में नफ़रत से प्रेरित उन्मादी भीड़ द्वारा हत्या की गई. देश में कई जगहों पर गाय के बहाने इंसान का खून बहाया जा रहा है. अख़लाक़, पहलू आदि की हत्याएं हुई हैं और 12-वर्षीय इम्तियाज़ को हत्यारी भीड़ ने पेड़ से टांग कर फांसी दे दी. झारखण्ड में बच्चा चोरी के अफ़वाहों के उकसावे में भीड़ ने शेख सज्जू, शेख सिराज, शेख हलीम, नईम, गौतम वर्मा, विकास वर्मा और गंगेश गुप्ता की हत्या की. राजस्थान में स्‍वच्‍छ भारत अभियान के नाम पर महिलाओं की फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी करने से रोकने पर भाकपा(माले) कार्यकर्ता जफर हुसैन की नगर पालिका कमिश्‍नर के उकसावे पर पालिका कर्मियों ने पीट पीट कर हत्‍या कर दी.
नफ़रत-प्रेरित इन हत्याओं के निशाने पर ज्यादातर अल्पसंख्यक और दलित समुदाय के लोग हैं. पर नफ़रत की आग दावानल की तरह है - पडोसी के घर को जला डालने की मंशा से लगायी गई आग किसी के घर को नहीं बक्शेगी. नफ़रत की आग में हमारे पूरे देश को झोंक देने की कोशिश की जा रही है और हमारी एकता, हमारे साझे आन्दोलनों में हमारी साझी ताकत को कमज़ोर करने की कोशिश की जा रही है.
ऐसे माहौल में हमे उन्मादी भीड़ की हिंसा की किसी भी तरह की कार्यवाही के खिलाफ खड़े होने की ज़रूरत है। हम लोगों को अफ़वाह और नफ़रत फ़ैलाने वाली ताकतों से सावधान रहने की ज़रूरत है।
इसी मकसद से हमने भारत के संविधान के साथ एक जन-संकल्प अभियान शुरू किया है. भारत के संविधान की प्रस्तावना समता, स्वन्त्रता और धर्मनिरपेक्षता के सिधांतो को सामने रखते हुए देश के हर नागरिक को अपनी सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक विचार, विश्वास व अभियक्ति की स्वन्त्रता का अधिकार देता है. जबकि आज हमारी आपसी एकता पर नफरत की राजनीति का हमला है और हमारे विचार, विश्वास और अभिव्यक्ति को कुचलने की कोशिश की जा रही है. इस माहौल में जन-संकल्प अभियान की तरफ से आपसे अपील करते हैं कि अपने देश के संविधान को हाथ में लेकर हम संकल्प लें-
 *हम किसी भी बहाने सांप्रदायिक व जातीय हिंसा का हिस्सा नहीं बनेंगे।*
 *हम अफ़वाह और नफ़रत फ़ैलाने की किसी भी तरह की कोशिश के खिलाफ़ खड़े होंगे।*
 *हम देश में समता, स्वतंत्रता, एकता और भाईचारा का सन्देश फैलायेंगे।*
*_साथ ही हम किसी भी जातीय व सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ सख्त कार्यवाही और कानून की मांग करते हैं._*
*_नफरत और हिंसा मिटाओ_* –
*_अधिकार आन्दोलनों से एकता बनाओ_*
यह जन संकल्प अभियान दिल्ली एन सी आर के विभिन्न इलाकों में 15 जुलाई से 15 अगस्त तक चलेगा, जिसमें नुक्कड़ सभा, जन-सम्मलेन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जायेगा. आप समस्त नागरिकों से अपील है कि इस संकल्प अभियान के साथ जुड़े और अन्य लोगों को जोड़ने में सहयोग करें.
निवेदक- *भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले), आइसा, ऐक्टू, AIPF, NTUI, बिल्डिंग वर्कर्स यूनियन, ऐपवा, दिल्ली नागरिक मंच*

https://www.facebook.com/umaip/posts/1351902268192053

Monday, 3 July 2017

जनविरोधी, लोकतंत्र विरोधी सरकारों को उखाड़ फेंकने का काम सिर्फ छात्र-नौजवान ही कर सकते हैं ------ नितिन राज


Uma Raag



Uma Raag
०३-०७-२०१७ 
(उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पिछली 7 जून को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आइसा समेत कई संगठनों के छात्रों ने विरोध-प्रदर्शन किया था। इस मौके पर एक दर्जन से ज्यादा छात्रों और उनके नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तारी के बाद इन सब पर गंभीर आपराधिक धाराएं लगा दी गयी थीं। निचली अदालत से जमानत खारिज होने के बाद तकरीबन तीन हफ्ते बाद इन नेताओं को ऊपरी अदालत से जमानत मिल पायी। लेकिन अभी भी आइसा के एक नेता नितिन राज को जमानत नहीं मिल सकी है। बताया जा रहा है कि इसके पीछे वजह पुलिस द्वारा मांगी गई घूस का न दिया जाना है। बाकी साथियों की रिहाई के बाद जेल में अकेले बंद नितिन राज ने एक पत्र जारी किया है। पेश है नितिन का पत्र।)

आज शायद भारतीय छात्र आन्दोलन अपने इतिहास के सबसे दमनात्मक दौर से गुजर रहा है, जहाँ छात्रों को अपनी लोकतान्त्रिक माँगों को लेकर की गई छात्र आन्दोलन की सामान्य कार्यवाही के लिए भी राजसत्ता के इशारे पर महीनों के लिए जेल में डाल दिया जा रहा है। छात्र आन्दोलन से घबराई योगी सरकार, जो कि इसे किसी भी शर्त पर कुचल देना चाहती है, हमें इतने दिनों तक जेल में रख कर हमारे मनोबल को तोड़ने की कोशिश कर रही है। लेकिन हम क्रान्तिकारी परम्परा के वाहक हैं हमारे आदर्श भगतसिंह और चंदू हैं, सावरकर नहीं, जो जेल के भय से माफ़ीनामा लिखकर छूटे और अंग्रेजों की दलाली में लग गए। हमें अगर और दिनों तक जेल में रहना पड़ा तब भी हम कमजोर पड़ने वाले नहीं हैं।
कल जब हमारे साथ के सभी आन्दोलनकारी साथियों की रिहाई हो गई और मेरी नहीं हुई तो पहले कुछ कष्ट हुआ लेकिन जब से पता चला कि मेरी रिहाई BKT थाने में हमारे साथियों द्वारा रिश्वत देने से इंकार करने के चलते रुकी है तब मुझे जानकर ख़ुशी हुई। यदि रिश्वत देकर मेरी रिहाई कल हो गई होती तो मैं छूट तो जाता परन्तु वो भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन, जिसके चलते मैं जेल में आया, शायद हार जाता। जो कि इस आन्दोलन की मुख्य अंतर्वस्तु को ही भटका देता। मुझे गर्व है कि मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ सही मायने में लड़ रहा हूँ और अपने सिद्धांतों के साथ खड़ा हूँ भले ही मुझे इसके लिए अधिक दिनों तक जेल में क्यों न रहना पड़ रहा हो। जेल में मैं बस हमारे प्रिय छात्रनेता चंद्रशेखर प्रसाद (चंदू) के शब्दों में “ यह मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है कि मैं चे ग्वेरा की तरह जियूँ और भगतसिंह की तरह मरूं”, को याद करके खुद को राजसत्ता के दमन से ज्यादा मजबूत पाता हूँ और लड़ने की एक नई ऊर्जा प्राप्त करता हूँ।
आज पूरे देश में जिस तरीके से कार्पोरेट फासीवादी ताकतों की सत्ता स्थापित है उसमें लगातार दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं व अन्य वंचित तबकों पर हमले बढ़ रहे हैं। पूरे देश में एक ऐसी भीड़ पैदा की जा रही है जो सिर्फ अफवाह के चलते किसी की भी हत्या कर दे रही है। हमारे किसान जब अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो उन्हें गोली से उड़ा दिया जा रहा है। अगर छात्र-नौजवान शिक्षा और रोजगार की बात करता है तो उसे जेल में ठूंस दिया जा रहा है, जो भी सरकार पर सवाल उठाता है उसे देशद्रोही करार दे दिया जाता है। इस भयानक दौर में मैं देश के सभी छात्र नौजवानों से अपील करता हूँ कि भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरणा लेते हुए समाज के सभी उत्पीड़ित तबकों को गोलबंद कर इन जनविरोधी, लोकतंत्र विरोधी सरकारों को उखाड़ फेंकने की जिम्मेदारी लें। ये काम सिर्फ छात्र-नौजवान ही कर सकते हैं।
अंत में मैं फिर इन सरकारों से कहना चाहता हूँ कि तुम्हारा कोई भी दमन और तुम्हारे भ्रष्टतंत्र की कोई भी बेशर्मी और बेहयाई क्रांतिकारी नौजवानों के मंसूबों को तोड़ नहीं सकती।
इंकलाब जिंदाबाद !!
नितिन राज
नेता, आइसा
जिला कारागार, लखनऊ
दिनांक-02.07.2017
https://www.facebook.com/umaip/posts/1345179175531029



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Sunday, 21 May 2017

व्यवस्था की सड़न समाज को बर्बरता के रास्ते प्रकृति को नष्ट कर पूरे जीवन को ही खतरे में डाल रही है ------ मुकेश त्यागी

 निजी संपत्ति की समाप्ति और सामाजिक उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व में सामूहिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए उत्पादन के लिए विज्ञान-तकनीक का भरपूर प्रयोग ही ना सिर्फ सबको रोजगार दे सकता है बल्कि अमानवीय श्रम से मुक्ति भी......................लेकिन यह खुद ब खुद होगा नहीं, करना पड़ेगा, नहीं तो इस व्यवस्था की सड़न अब समाज को बर्बरता के रास्ते पर ले जा रही है और प्रकृति को नष्ट कर पूरे जीवन को ही खतरे में डाल रही है ।  
Mukesh Tyagi
विकल्प का अर्थ क्या है? बेरोज़गारी के समाधान के लिए क्या वर्तमान व्यवस्था में कुछ तात्कालिक सुधार जैसे पब्लिक सेक्टर को मजबूत करना, सरकारी खर्च बढ़ाना, पूँजीपति मालिकों पर कुछ रोकथाम करना, छँटनी पर रोक लगाना, सरकार द्वारा पूँजी केंद्रित के बजाय श्रम केंद्रित अर्थात आधुनिक तकनीक के बजाय पुरानी तकनीक पर आधारित उद्योगों में निवेश करना, आदि वास्तव में विकल्प हैं? आर्थिक ग़ैरबराबरी के लिए क्या आयकर की ऊँची दर, सम्पत्ति कर, विरासत पर कर, कर्मचारियों का वेतन, मजदूरी बढ़ाना, किसानों को फसल की ऊँची कीमतें देना क्या वास्तव में आज विकल्प है? सामाजिक-जनवाद या संसदीय वाम धारा की नजर में यह विकल्प है, लेकिन क्या यह वास्तविकता में एक विकल्प है? समझने के लिए हमें उपरोक्त नीति किस ऐतिहासिक परिस्थिति में लागू की गई, यह जानना जरुरी है| 
जॉन मेनार्ड कींस के कल्याणकारी राज्य और उसके साथ जुड़े ब्रेटन वुड्स के आर्थिक ढाँचे की नीति निम्न विशेषताओं वाले वक़्त में आई थी-
1. द्वितीय विश्व युद्ध में विकसित पूँजीवादी और अन्य देशों में उत्पादक शक्तियों का भारी विनाश और पुनर्निर्माण का दौर 
2. युद्ध द्वारा यूरोप/जापान के उत्पादक उम्र के करोड़ों श्रमिकों की हत्या और अपंग किया जाना
3. दुनिया भर के अविकसित देशों में पूँजीवादी बाज़ार के विस्तार की अपार सम्भावना
4. दुनिया भर में जुझारू मजदूर आंदोलनों के उभार और समाजवादी खेमे की शक्ति का भय
इस विशेष परिस्थिति में एक तो तात्कालिक तौर पर उत्पादन का विस्तार मुमकिन था, बेरोजगारों की बड़ी फ़ौज मौजूद नहीं थी, अविकसित देशों के शोषण से प्राप्त मुनाफ़े से विकसित देशों के मजदूरों को एक हिस्सा देना मुमकिन था और साथ में, उनको जुझारू मजदूर आंदोलन के रास्ते जाने रोककर वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के दायरे में ही सौदेबाज़ी के जरिये अपनी स्थिति में सुधार का भ्रम पैदा करना भी जरुरी था| इस स्थिति में कल्याणकारी राज्य और ऊपर दी गई नीतियों को लागू किया गया| 
भारत में भी 1930 के दशक में ही स्पष्ट हो गया था कि देश को आजाद होना ही है और कांग्रेस उसके बाद के लिए एक राष्ट्रीय योजना समिति बना चुकी थी| 1942 के जनांदोलनों ने पूँजीपतियों को बुरी तरह डरा दिया था कि यह निजी संपत्ति के खिलाफ आंदोलन में बदल सकता है| उस वक्त के एक बड़े उद्योगपति लाला श्रीराम (DCM) ने दूसरे पुरुषोत्तम ठाकुरदास को लिखा था 'यह तोड़फोड़ निजी संपत्ति के खिलाफ भी जा सकती है| एक बार ये गुंडे ('आजादी के योद्धा!') यह समझे तो हुकूमत इन्हें बाँध नहीं पायेगी| आज तो महात्मा गाँधी इन्हें रोक पा रहे हैं, पर मुमकिन है आगे न रोक पायें|'
साथ ही पूँजीपति वर्ग को अपनी पूँजी और मुक्त बाज़ार की सीमाओं का भी पता था| उन्हें अपने विकास के लिए सत्ता के समर्थन की जरुरत महसूस हो रही थी| ऐसे में 8 उद्योगपतियों-प्रबंधकों ने कांग्रेस को जनवरी 1944 में बॉम्बे प्लान (A Brief Memorandum Outlining a Plan of Economic Development for India)  * नामक योजना दी जिसका दूसरा संस्करण 1945 में बना| इसके लेखक थे जेआरडी टाटा, घनश्यामदास बिड़ला, लाला श्रीराम, पी ठाकुरदास, कस्तूरभाई लालभाई, एड़ी श्रॉफ, अर्देशिर दलाल और जॉन मथाई| इनमें से श्रॉफ ब्रेटन वुड्स की बैठक में भी शामिल होकर आये थे और विश्व पूँजीवादी व्यवस्था की दिशा से भी परिचित थे| इन्होने आजादी के बाद पहले 15 वर्ष की आर्थिक नीतियों के लिए क्या सुझाव दिए?
1. बाजार और पूँजी का सरकार द्वारा नियमन और विनियोजन
2. पब्लिक सेक्टर में भारी, पूँजी केंद्रित उद्योगों की स्थापना
3. घाटे के बजट द्वारा सरकारी खर्च को बढ़ाना 
4. विदेशी प्रतियोगिता से देशी उद्योगों की सुरक्षा 
5. समानता और न्यायपूर्ण विकास की योजना
6. कृषि आधारित से उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था में संक्रमण 
कहने की जरुरत नहीं कि ठीक यही पूँजीवादी सुझाव नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने समाजवादी विकास के नाम पर अपनाये और पहली तीनों पँचवर्षीय योजनायें पूरी तरह इस बॉम्बे प्लान पर ही आधारित थीं और इसके परिणामस्वरूप देशी पूँजीपतियों की पूँजी में तेजी से वृद्धि हुई| साथ ही मजदूर वर्ग के संगठित अभिजात हिस्से को भी कुशल तकनीकी श्रमिकों की माँग के कारण शेष जनता की तुलना में बेहतर सुविधायें प्राप्त हुईं| 
पर पूँजीवादी विकास और वृद्धि का यह दौर अस्थाई सिद्ध हुआ| दुनिया और भारत में 1965 के बाद ही इसके नतीजे में संकट की स्थिति पैदा होने लगी, असंतोष फ़ैलने लगा| सबसे बुरी बात यह कि इस दौर में कम्युनिस्ट पार्टियों और ट्रेड यूनियनों ने संशोधनवादी धारा हावी हुई जिसने मजदूर वर्ग को इस अस्थाई दौर की वास्तविकता बताने के बजाय इसे पूँजीवाद के चरित्र में बदलाव बताया और सिखाया कि अब पूँजीवाद को उखाड़ फेंकने, क्रांति करने की जरुरत ख़त्म; कल्याणकारी पूँजीवाद में संगठित सौदेबाजी के द्वारा ही शांति से मज़दूर अपनी स्थिति में सुधार कर सकते हैं| विकास के दौर में तो यह शांति की बात बड़ी अच्छी लगी, यूनियनें भी बढ़ीं, संसद में सीटें भी मिलीं, कम्युनिस्ट मंत्री बनकर पूँजीवादी सरकार भी चलाने लगे| लेकिन पूँजीपति हमेशा अधिक वर्ग सचेत होता है| संकट का दौर आते ही और कम्युनिस्ट आंदोलन की वैचारिक कमजोरी को भाँपते ही उसने कल्याणकारी राज्य का विध्वंस और नव-उदारवाद नीतियों को लागू करना शुरू कर दिया, मजदुरी कम होने लगी, सरकारी खर्च में कटौती चालू, कल्याण कार्यक्रम कम, पब्लिक सेक्टर का निजीकरण, युनियनों पर दमन और छँटनी जारी हुई| गलत शिक्षा दे चुका संसदीय वाम अब मजदूरों को सचेत कैसे करता, वे उसको छोड़कर सत्ता के करीबी कांग्रेस, समाजवादी और फिर संघ की यूनियनों में जाने लगे| यही विभ्रम का दौर संसदीय वाम को आज की हताशा की स्थिति तक ले आया है|
मार्क्सवाद के क्रांतिकारी विचार को छोड़ चुका और लेनिनवाद को अप्रासंगिक मान चुका संसदीय वाम फिर भी एक निश्चित दौर की पूँजीवादी शासक वर्ग की नीति को ही अपनी नीति माने बैठा है, पूँजीवाद के अंदर ही पब्लिक सेक्टर और सरकारी नियमन-योजना के द्वारा पूँजीवाद में सुधार को ही अपना रास्ता माने हुए है अर्थात क्रांति का रास्ता अब उसका रास्ता नहीं है|
आज जब पूरा विश्व पूँजीवाद ही एक अनंत आर्थिक संकट में है, एक संकट से निकलने का यत्न उसे और गहरे संकट में ले जाता है, बाज़ार के विस्तार की और कोई सम्भवनायें समाप्त हैं, तकनीक के द्वारा अधिक पूँजी निवेश और श्रम शक्ति के कम प्रयोग के रास्ते ही मुनाफे को बढ़ाने प्रयास कर रहा है, उस स्थिति में वह कल्याणकारी राज्य के दौर में वापस नहीं जा सकता बल्कि हर देश में इन सब कल्याण योजनाओं को बंद कर खुली लूट की नीति पर जा रहा है और इससे पैदा असंतोष के मुकाबले के लिए कमोबेश फासीवादी प्रवृत्तियों को ही आगे बढ़ा रहा है| 
इस स्थिति में अब निजी संपत्ति की समाप्ति और सामाजिक उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व में सामूहिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए उत्पादन के लिए विज्ञान-तकनीक का भरपूर प्रयोग ही ना सिर्फ सबको रोजगार दे सकता है बल्कि अमानवीय श्रम से मुक्ति भी| ऊपर ज़िक्र किये गए कोई भी सुझाव द्वारा निजी संपत्ति से श्रमिकों की श्रम शक्ति की खरीद द्वारा अधिकतम मुनाफे अर्जित करने के लिए वर्तमान पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था के दायरे में इन समस्याओं का समाधान मुमकिन नहीं, सिर्फ तात्कालिक भ्रम पैदा ही पैदा कर सकते हैं|
यही एकमात्र विकल्प है| लेकिन यह खुद ब खुद होगा नहीं, करना पड़ेगा, नहीं तो इस व्यवस्था की सड़न अब समाज को बर्बरता के रास्ते पर ले जा रही है और प्रकृति को नष्ट कर पूरे जीवन को ही खतरे में डाल रही है|
https://www.facebook.com/MukeshK.Tyagi/posts/1785861101440363
 Mukesh Tyagi बॉम्बे प्लान के विस्तृत विवरण के लिए लिंक https://nzsac.files.wordpress.com/.../bombayplanfornzsac.pdf

Author's Introduction : 

Sunday, 7 May 2017

नव वाम पंथियो को होश की दवा की जरूरत है.................... गिरीश मालवीय





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मार्क्सवाद का एक भारतीय संस्करण न खड़ा कर पाना मेरी नजर मे वाम पंथियो की सबसे बड़ी नाकामी है....................रूस मे लेनिन और चीन मे माओ, आदि नेताओ ने अपने विशिष्ट सिद्धान्त सामने रखे जो उस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के अनुकूल थे लेकिन भारत में क्या हुआ........................दरअसल 1990 के दशक मे इस देश मे कुछ क्रन्तिकारी राजनितिक सामाजिक परिवर्तन आये, जिस से कदम ताल मिला पाने मे वामपंथ असफल रहा वह अब भी घिसे पिटे ढर्रे को लेकर चल रहा है जो अब बिलकुल प्रासंगिक नही रहा , आपको लग रहा है क़ि यह पीढ़ी पूंजीवाद, वर्गसंघर्ष,द्वंदात्मक भौतिकवाद को ठीक वैसा समझेगी जैसा वामपंथी सदियों से समझते आये है तो उन्हें नही नव वाम पंथियो को होश की दवा की जरूरत है....................
Girish Malviya
आज एक महत्वपूर्ण विषय उठा रहा हूँ क़ि भारत मे वाम दलों की राजनीति क्यो अप्रासंगिक हो गयी है ?
कुछ दिन पहले मार्क्स का जन्मदिन था भारत मे और विशेष कर फ़ेसबुक के कई मित्रो ने उन्हें याद किया लेकिन यहाँ प्रश्न मार्क्स की विचारधारा पर नही है प्रश्न मार्क्स के नामलेवा दल की कथनी और करनी पर है…..............
वैसे यह वाम दलों की जन प्रतिबध्दताओ की अच्छी मिसाल है क़ि जैसे ही आप जनता की समस्याओं को लेकर सत्ता की आलोचना करते है आप को सबसे पहले आपको कॉमरेड की उपाधि से विभूषित किया जाता है.................
लेकिन इसी के साथ यह प्रश्न खड़ा हो जाता है कि यदि वाम दल इतने ही लोकप्रिय रहे है तो भारत की राजनीति मे आज क्यों हाशिये पर धकेल दिए गए है यह एक बड़ा ही महत्वपूर्ण प्रश्न है ..............
कही पर पढ़ा था क़ि , किसी बड़े वाम नेता ने भविष्य वाणी की थी जिस दिन काँन्ग्रेस सत्ता से बाहर हो जायेगी उसके दस वर्ष के अंदर ही देश मे वामदलो का अस्तित्व संकट मे आ जायेगा, आज देखते है तो यह बात सही प्रतीत होती है क्या देश के सभी कम्युनिस्ट नेताओ ने इस बारे मे कोई चिंतन मंथन करने की कोशिश की....................
बंगाल जैसे राज्य मे वाम दल लंबे समय के लिए सत्ता से बाहर हो गए क्योकि उन्होंने खुद पूंजीपतियों से गठजोड़ करने मे कोई कोर कसर नही छोड़ी टाटा का सिंगुर विवाद इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, ...........
क्या वाम दलों को उत्तर और मध्य भारत मे हुए छोटे स्तर के जन आंदोलनों मे क्या अपना कोई योगदान दिखाई पड़ता है,........
हमे यह भी देखना चाहिए क़ि जिन देशों मे भी साम्यवाद आया वहा पर मार्क्सवाद का देशी संस्करण तैयार किया गया रूस मे लेनिन और चीन मे माओ, आदि नेताओ ने अपने विशिष्ट सिद्धान्त सामने रखे जो उस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के अनुकूल थे लेकिन भारत में क्या हुआ........................
भारत मे मार्क्सवादी इन देशों की पोलित ब्यूरो से निर्देश लेने मे लगे रहे जिससे भारतीय जनमानस मे यह विचार बना क़ि यह विदेशी शक्तियो की गुलामी करते है और यह विचार वाम दलों से इतना चिपक गया है कि वह इस दाग से पीछा छुड़ाना चाहे भी तो नही छुड़ा सकते
मार्क्सवाद का एक भारतीय संस्करण न खड़ा कर पाना मेरी नजर मे वाम पंथियो की सबसे बड़ी नाकामी है....................
ऐसे ही विचारो को लेकर मैंने एक अच्छे मित्र की वाल पर कॉमेंट किया कि इस देश मे कभी कम्युनिज्म आएगा इसकी कोई सम्भावना ही नही बची है, ............
दरअसल 1990 के दशक मे इस देश मे कुछ क्रन्तिकारी राजनितिक सामाजिक परिवर्तन आये, जिस से कदम ताल मिला पाने मे वामपंथ असफल रहा वह अब भी घिसे पिटे ढर्रे को लेकर चल रहा है जो अब बिलकुल प्रासंगिक नही रहा , आपको लग रहा है क़ि यह पीढ़ी पूंजीवाद, वर्गसंघर्ष,द्वंदात्मक भौतिकवाद को ठीक वैसा समझेगी जैसा वामपंथी सदियों से समझते आये है तो उन्हें नही नव वाम पंथियो को होश की दवा की जरूरत है....................



यह भारत की जनता का दुर्भाग्य ही है कि, जिस प्रकार मजहबी तीरथों  की यात्रा कर आए लोगों की पूजा होती है उसी प्रकार मास्को रिटर्नड कामरेड्स भी पूजे जाते हैं और उनकी विद्वता के साथ ही उनकी नीयत पर भी शक करने की गुंजाईश नहीं रहती है। वे चाहे साम्यवाद / वामपंथ को जनप्रिय बनाने के प्रयासों को 'कूड़ा फैलाने ' की संज्ञा दें अथवा एथीज़्म के फतवे से उनको खारिज कर दें उनके निर्णय को प्रश्नांकित नहीं किया जा सकता है और यही वजह है कि, साम्यवाद / वामपंथ प्रगति करने के बजाए विखंडित होता गया है। 
वामपंथ को जनप्रिय बनाने के प्रयासों को 'कूड़ा फैलाने ' की संज्ञा देने वाले मास्को रिटर्नड एक कामरेड के व्यक्तिगत इतिहास पर दृष्टिपात करें तो ज्ञात होता है कि, जब रूस से लौटते समय उनके पुत्र डिग्री के साथ- साथ उनके लिए रूसी पुत्र - वधू लाने की सूचना प्रेषित करते हैं तब उनका आंतरिक जातिवाद उनको ग्लानिग्रस्त कर देता है। इतना ही नहीं दूसरे पुत्र के लिए जब वह सपत्नीक रिश्ता तय करने जाते हैं तब उनकी कामरेड पत्नी ( जो महिला विंग की नेता के रूप में दहेज विरोधी भाषण देकर वाहवाही बटोर चुकी थीं ) एक लाख रुपयों की मांग पेश करती हैं। वह लड़की जो उनको पसंद थी उनके भाषण वाला अखबार उनको दिखाते हुये विवाह से इंकार कर देती है। तब उनका पुत्र ही माता - पिता से बगावत करके उसी लड़की से दहेज रहित विवाह कर लेता है। रोजगार छिनने पर जब वह अपने इन मास्को रिटर्नड कामरेड श्वसुर साहब से जायदाद में अपने हक की मांग करती है तब ये लोग उसे पीट कर भगा देते हैं  थाने में इनकी पहुँच के चलते इनकी पुत्र वधू की FIR नहीं लिखी जाती है। इनके जैसे मास्को रिटर्नड कामरेड करोड़ों की संपत्तियाँ बटोरने में मशगूल हैं और पार्टी के नियंता भी बने हुये हैं तब कैसे  कम्यूनिज़्म कामयाब हो ?
वामपंथ /साम्यवाद का भारत में प्रस्तुतीकरण (WAY OF PRESENTATION) नितांत गलत है जिसे जनता ठुकरा देती है। यदि अपनी बात को भारतीय संदर्भों व भारतीय महापुरुषों के दृष्टांत देकर प्रस्तुत किया जाये तो निश्चय ही जनता की सहानुभूति व समर्थन मिलेगा। उदाहरणार्थ खुद को नास्तिक - एथीस्ट कहते हैं और जनता के कोपभाजन का शिकार होते हैं। मजहब धर्म नहीं है वह पंथ या संप्रदाय है जबकि, समस्या की जड़ है-ढोंग-पाखंड-आडंबर को 'धर्म' की संज्ञा देना तथा हिन्दू,इसलाम ,ईसाईयत आदि-आदि मजहबों को अलग-अलग धर्म कहना जबकि धर्म अलग-अलग कैसे हो सकता है? वास्तविक 'धर्म' को न समझना और न मानना और ज़िद्द पर अड़ कर पाखंडियों के लिए खुला मैदान छोडना संकटों को न्यौता देना है। धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
भगवान =भ (भूमि-ज़मीन )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी)
चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं।
इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।
पोंगापंथी वेद और पुराण को एक कहते हैं और वामपंथ भी जबकि, पुराण कुरान की तर्ज़ पर विदेशी शासकों द्वारा ब्राह्मणों से लिखवाये वे ग्रंथ हैं जिनमें भारतीय महापुरुषों का चरित्र हनन किया गया है। 'वेद ' कृणवन्तो विश्वमार्यम की बात करते हैं अर्थात सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाने की बात इसमें देश- काल- लिंग-जाति-
वर्ण का कोई भेद नहीं है यह समानता का भाव है। लेकिन वामपंथ / साम्यवाद के द्वारा उस ढोंग का समर्थन किया जाता है कि, 'आर्य ' एक विदेशी जाति है जो बाहर से आई थी। जबकि, 'आर्य ' न कोई जाति है न ही धर्म बल्कि मानवता को श्रेष्ठ बनाने की समष्टिवादी ( समानता पर आधारित ) व्यवस्था है। जिस दिन वामपंथ / साम्यवाद लेनिन व स्टालिन की बात मान कर भारतीय संदर्भों का अवलंबन शुरू कर देगा उसी दिन से जनता इसे सिर - माथे पर ले लेगी। महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी 'साम्यवाद' को देश - काल - परिस्थितियों के अनुसार लागू करने की बात कही है लेकिन भारत के वामपंथी / साम्यवादी न मार्क्स की बात मानते हैं न ही लेनिन व स्टालिन की। केवल चलनी में दूध छानते रहेंगे और दोष अपनी कार्य प्रणाली को न देकर जनता को देते रहेंगे तब क्या जनता का समर्थन हासिल कर सकते हैं ?
(विजय राजबली माथुर )

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Thursday, 27 April 2017

Lets say! Red salute! to Comrade A B Bhardhan ------ Arvind Raj Swarup Cpi




Arvind Raj Swarup Cpi
Lets say! Red salute! to Comrade A B Bhardhan
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Daughter, Son Handover
Com A B Bardhan’s Savings to Party
Daughter Dr Alka Barua and son Ashok Bardhan of former general secretary of the Communist Party of India and a veteran communist and trade union leader of the country Com A B Bardhan handed over the savings of their father to party. A letter along with a cheque for Rs 11 lakh drawn in favour of the Party and Rs 1 lakh drawn in favour of the Joshi-Adhikari Institute were sent to party general secretary S Sudhakar Reddy.
After receiving the cheque and the letter which assured to send some more savings of Com Bardhan later, Sudhakar Reddy in his letter sent on April 20, 2017 to Dr Alka Barua acknowledging receipt of both, and profusely thanked them for continuing support from Com Bardhan’s family for the party. The general secretary made it clear that the money received will be deposited in a fund dedicated to the memory of Com A B Bardhan and the interest getting accrued would be used to hold endowment lectures and political schools in memory of Com Bardhan.

Tuesday, 18 April 2017

पुस्तकीय विचार और व्यवहार की अनदेखी : वाम धारा के भटकाव का कारण ------ विजय राजबली माथुर


'केवल विचार पर पुस्तकीय विचार हो और व्यवहार की अनदेखी हो तो परिणाम पर फर्क तो पड़ेगा न !' --- अजित कुमार वर्मा जी का निष्कर्ष सटीक और विचारणीय है। ...........................मास्को रिटर्नड कामरेड करोड़ों की संपत्तियाँ बटोरने में मशगूल हैं और पार्टी के नियंता भी बने हुये हैं तब कैसे  कम्यूनिज़्म कामयाब हो ?


वामपंथ /साम्यवाद का भारत में प्रस्तुतीकरण (WAY OF PRESENTATION) नितांत गलत है जिसे जनता ठुकरा देती है। यदि अपनी बात को भारतीय संदर्भों व भारतीय महापुरुषों के दृष्टांत देकर प्रस्तुत किया जाये तो निश्चय ही जनता की सहानुभूति व समर्थन मिलेगा। उदाहरणार्थ खुद को नास्तिक - एथीस्ट कहते हैं और जनता के कोपभाजन का शिकार होते हैं। मजहब धर्म नहीं है वह पंथ या संप्रदाय है जबकि, समस्या की जड़ है-ढोंग-पाखंड-आडंबर को 'धर्म' की संज्ञा देना तथा हिन्दू,इसलाम ,ईसाईयत आदि-आदि मजहबों को अलग-अलग धर्म कहना जबकि धर्म अलग-अलग कैसे हो सकता है? वास्तविक 'धर्म' को न समझना और न मानना और ज़िद्द पर अड़ कर पाखंडियों के लिए खुला मैदान छोडना संकटों को न्यौता देना है। धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
भगवान =भ (भूमि-ज़मीन )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी)
चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं।
इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।
पोंगापंथी वेद और पुराण को एक कहते हैं और वामपंथ भी जबकि, पुराण कुरान की तर्ज़ पर विदेशी शासकों द्वारा ब्राह्मणों से लिखवाये वे ग्रंथ हैं जिनमें भारतीय महापुरुषों का चरित्र हनन किया गया है। 'वेद ' कृणवन्तो विश्वमार्यम की बात करते हैं अर्थात सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाने की बात इसमें देश- काल- लिंग-जाति-
वर्ण का कोई भेद नहीं है यह समानता का भाव है। लेकिन वामपंथ / साम्यवाद के द्वारा उस ढोंग का समर्थन किया जाता है कि, 'आर्य ' एक विदेशी जाति है जो बाहर से आई थी। जबकि, 'आर्य ' न कोई जाति है न ही धर्म बल्कि मानवता को श्रेष्ठ बनाने की समष्टिवादी ( समानता पर आधारित ) व्यवस्था है। जिस दिन वामपंथ / साम्यवाद लेनिन व स्टालिन की बात मान कर भारतीय संदर्भों का अवलंबन शुरू कर देगा उसी दिन से जनता इसे सिर - माथे पर ले लेगी। महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी 'साम्यवाद' को देश - काल - परिस्थितियों के अनुसार लागू करने की बात कही है लेकिन भारत के वामपंथी / साम्यवादी न मार्क्स की बात मानते हैं न ही लेनिन व स्टालिन की। केवल चलनी में दूध छानते रहेंगे और दोष अपनी कार्य प्रणाली को न देकर जनता को देते रहेंगे तब क्या जनता का समर्थन हासिल कर सकते हैं ?











'केवल विचार पर पुस्तकीय विचार हो और व्यवहार की अनदेखी हो तो परिणाम पर फर्क तो पड़ेगा न !' --- अजित कुमार वर्मा जी का निष्कर्ष सटीक और विचारणीय है। 
यह भारत की जनता का दुर्भाग्य ही है कि, जिस प्रकार मजहबी तीरथों  की यात्रा कर आए लोगों की पूजा होती है उसी प्रकार मास्को रिटर्नड कामरेड्स भी पूजे जाते हैं और उनकी विद्वता के साथ ही उनकी नीयत पर भी शक करने की गुंजाईश नहीं रहती है। वे चाहे साम्यवाद / वामपंथ को जनप्रिय बनाने के प्रयासों को 'कूड़ा फैलाने ' की संज्ञा दें अथवा एथीज़्म के फतवे से उनको खारिज कर दें उनके निर्णय को प्रश्नांकित नहीं किया जा सकता है और यही वजह है कि, साम्यवाद / वामपंथ प्रगति करने के बजाए विखंडित होता गया है। 
वामपंथ को जनप्रिय बनाने के प्रयासों को 'कूड़ा फैलाने ' की संज्ञा देने वाले मास्को रिटर्नड एक कामरेड के व्यक्तिगत इतिहास पर दृष्टिपात करें तो ज्ञात होता है कि, जब रूस से लौटते समय उनके पुत्र डिग्री के साथ- साथ उनके लिए रूसी पुत्र - वधू लाने की सूचना प्रेषित करते हैं तब उनका आंतरिक जातिवाद उनको ग्लानिग्रस्त कर देता है। इतना ही नहीं दूसरे पुत्र के लिए जब वह सपत्नीक रिश्ता तय करने जाते हैं तब उनकी कामरेड पत्नी ( जो महिला विंग की नेता के रूप में दहेज विरोधी भाषण देकर वाहवाही बटोर चुकी थीं ) एक लाख रुपयों की मांग पेश करती हैं। वह लड़की जो उनको पसंद थी उनके भाषण वाला अखबार उनको दिखाते हुये विवाह से इंकार कर देती है। तब उनका पुत्र ही माता - पिता से बगावत करके उसी लड़की से दहेज रहित विवाह कर लेता है। रोजगार छिनने पर जब वह अपने इन मास्को रिटर्नड कामरेड श्वसुर साहब से जायदाद में अपने हक की मांग करती है तब ये लोग उसे पीट कर भगा देते हैं  थाने में इनकी पहुँच के चलते इनकी पुत्र वधू की FIR नहीं लिखी जाती है। इनके जैसे मास्को रिटर्नड कामरेड करोड़ों की संपत्तियाँ बटोरने में मशगूल हैं और पार्टी के नियंता भी बने हुये हैं तब कैसे  कम्यूनिज़्म कामयाब हो ?


Friday, 14 April 2017

पी.सी जोशी को जयन्ती पर क्रांतिकारी सलाम ------ श्रवण कुमार



Sharwan Kumar
भारतीय जननाट्य संध(इप्टा) के संस्थापकों में एक कामरेड पी.सी जोशी(पूरनचन्द जोशी) की आज जयन्ती है। वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रथम महासचिव थे।
उनका जन्म आज ही की तिथि 14 अप्रैल, 1907 को अल्मोड़ा(उत्तराखंड) में हुआ था। वे एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे।अँग्रेजों के विरूद्ध गोपनीय गतिविधि में सक्रिय भूमिका के कारण वे गिरफ्तार हुए और 'मेरठ षड्यंत्र केस'(1929) केस में उन्हे 1933 तक जेल में रहना पड़ा। जेल से बाहर आने के बाद 1936 में वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रथम महासचिव बने। उन्होंने 1951 में इलाहाबाद से 'इंडिया टुडे' पत्रिका भी निकाली। विद्यार्थी संगठन एवं मजदूर संगठन की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। कम्युनिस्ट आंदोलन से संबंधित उनकी बहुत सारी किताबें हैं । कुछ सालों तक वे सीपीआई के मुख पत्र 'न्यू एज' के सम्पादक भी रहे।आइए महान संगठनकर्ता, मार्क्सवादी चिंतक,लेखक कामरेड पी.सी जोशी को उनकी जयन्ती पर क्रांतिकारी सलाम पेश करते हैं ।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1898369473765820&set=a.1388791514723621.1073741826.100007783560528&type=3

Dr. Ambedkar on Communist Party of India ------ S.r. Darapuri


S.r. Darapuri
2016 May 29 at 6:57pm
Dr. Ambedkar on Communist Party of India
“The Communist Party was originally in the hands of some Brahman boys- Dange and others. They have been trying to win over the Maratha community and Scheduled Castes. But they have made no headway in Maharashtra. Why? Because they are mostly a bunch of Brahman boys. The Russians made a great mistake to entrust the Communist movement in India to them. Either the Russians did not want Communism in India- they wanted only drummer boys- or they did not understand.”
– Dr. BR Ambedkar’s interview on 21/2, 28/2 and 9/10/53 at Alipore Road, Delhi by Selig Harrison in “Most Dangerous Decades” published by Oxford Press.



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आज भी तो वही स्थिति है, सभी कम्युनिस्ट पार्टियों का नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथों में है। सबसे पुरानी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में पहुँच चुके मोदीईस्ट कामरेड तो उत्तर प्रदेश में ओ बी सी और दलित वर्ग के कामरेड्स से सिर्फ काम लेने व उनको कोई पद न देने की मुहिम चलाये रखते हैं । इसी ध्येय की पूर्ती हेतु प्रदेश में दो बार पार्टी तोड़ चुके हैं। सात में से चार सदस्य नेशनल काउंसिल में प्रदेश से ब्राह्मण हैं जिनमें से तीन एक ही परिवार के हैं। 
ऐसा ही लगता है कि, सत्ता प्राप्ति से दूर रह कर कुछ बाजरवादी/कार्पोरेटी ब्राह्मण कामरेड्स अपने परिवार की समृद्धि को ही क्रांति की सफलता माने हुये हैं। डॉ अंबेडकर ने तब सही ही तो कहा था। 


(विजय राजबली माथुर )

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Thursday, 13 April 2017

इंटरनेट माध्यम से पार्टी नेता की जड़ता, मूर्खता,कूपमंडूकता आदि से मुक्ति मिलेगी ------ जगदीश्वर चतुर्वेदी

*वामदल आज हाशिए पर हैं उसके कई कारण हैं उनमें एक बड़ा कारण है कम्युनिकेशन की नई वास्तविकता को आत्मसात न कर पाना। वे क्यों इंटरनेट के संदर्भ में अपनी गतिविधियों और संचार की भूमिका को सुसंगठित रुप नहीं दे पाए हैं यह समझना मुश्किल है। --- जगदीश्वर चतुर्वेदी 
*"क्योंकि ये लोग खुद वैचारिक रूप से मजबूत नहीं है" ---AISF नेता राम कृष्ण 
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Jagadishwar Chaturvedi
इंटरनेट और उससे जुड़े माध्यमों और विधा रुपों के आने के बाद से संचार की दुनिया में मूलगामी बदलाव आया है। वैचारिक संघर्ष पहले की तुलना में और भी ज़्यादा जटिल और तीव्र हो गया है। जनसंपर्क और जनसंवाद पहले की तुलना में कम खर्चीला और प्रभावशाली हो गया है। लेकिन वामदलों और ख़ासकर कम्युनिस्ट पार्टियों में इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल नज़र नहीं आती। यह सच है कि वामदलों के पास बुद्धिजीवियों का बहुत बड़ा ज़ख़ीरा है और ज्ञान के मामले में ये लोग विभिन्न क्षेत्र में बेजोड़ हैं। आज भी भारत की बेहतरीन समझ के विभिन्न क्षेत्रों में मानक इन्होंने ही बनाए हैं। लेकिन इंटरनेट जैसे प्रभावशाली माध्यम के आने के बाद वामदलों के रवैय्ये में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है।वामदल आज हाशिए पर हैं उसके कई कारण हैं उनमें एक बड़ा कारण है कम्युनिकेशन की नई वास्तविकता को आत्मसात न कर पाना। वे क्यों इंटरनेट के संदर्भ में अपनी गतिविधियों और संचार की भूमिका को सुसंगठित रुप नहीं दे पाए हैं यह समझना मुश्किल है। 
वामदल जानते हैं कि नेट कम्युनिकेशन न्यूनतम खर्चे पर चलने वाला कम्युनिकेशन है। यह ऐसा कम्युनिकेशन है जो लोकतांत्रिक होने के लिए मजबूर करता है। यह दुतरफ़ा कम्युनिकेशन है। यहाँ दाता और गृहीता एक ही धरातल पर रहते हैं और रीयल टाइम में मिलते हैं। यहाँ आप अपनी-अपनी कहने के लिए स्वतंत्र हैं साथ ही अन्य की रीयल टाइम में सुनने ,सीखने और बदलने के लिए भी मजबूर हैं। विचारों में साझेदारी और उदारता इसका बुनियादी आधार है। 
वामदलों की नियोजित नेट गतिविधियाँ इकतरफ़ा कम्युनिकेशन की हैं और इसे बदलना चाहिए। दुतरफ़ा कम्युनिकेशन की पद्धति अपनानी चाहिए। वामदलों की वेबसाइट हैं लेकिन वहाँ यूजरों के लिए संवाद की कोई खुली जगह नहीं है।वामदलों के बुद्धिजीवियों- लेखकों आदि को कम्युनिकेशन के प्रति अपने पुराने संस्कारों को नष्ट करना होगा। 'हम कहेंगे वे सुनेंगे', ' हम लिखेंगे वे पढेंगे' , 'हम देंगे वे लेंगे' इस सोच के ढाँचे को पूरी तरह नष्ट करने की ज़रुरत है। नये दौर का नारा है 'हम कहेंगे और सीखेंगे',' हम कहेंगे और बदलेंगे'। 
इंटरनेट कम्युनिकेशन आत्मनिर्भर संचार पर ज़ोर देता है । वामदलों के लोग परनिर्भर संचार में जीते रहे हैं। नए दौर की माँग है आत्मनिर्भर बनो। रीयल टाइम में बोलो। बिना किसी की इजाज़त के बोलो।पार्टी की लक्ष्मणरेखा के बाहर निकलकर लोकतान्त्रिक कम्युनिकेशन में शामिल हो और लोकतांत्रिक ढंग से कम्युनिकेट करो। पार्टी में नेता को हक़ है बोलने का , नेता को हक़ है लाइन देने का, पार्टी अख़बार में नेता को हक़ है लिखने का। लेकिन इंटरनेट में प्रत्येक पार्टी सदस्य और हमदर्द को हक़ है बोलने, लिखने और अपनी राय ज़ाहिर करने का। यह राय ज़ाहिर करने का वैध और लोकतांत्रिक मीडियम है । यह प्रौपेगैण्डा का भी प्रभावशाली मीडियम है। यह कम खर्चीला मीडियम है और इसमें शामिल होकर सक्रिय रहने से संचार की रुढियों से मुक्ति मिलने की भी संभावनाएँ हैं। अभी स्थिति यह है कि फ़ेसबुक पर वाम मित्र लाइक करने, एकाध पोस्ट लिखने, फ़ोटो शेयर करने से आगे बढ़ नहीं पाए हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए और वामदलों को सुनियोजित ढंग से अपने सदस्यों को खुलकर इंटरनेट माध्यमों पर अपनी राय ज़ाहिर करने के लिए प्रेरित करना चाहिए इससे पार्टी नेता की जड़ता, मूर्खता,कूपमंडूकता आदि से मुक्ति मिलेगी।
https://www.facebook.com/jagadishwar9/posts/1608776012484433

"क्योंकि ये लोग खुद वैचारिक रूप से मजबूत नहीं है"  ------  "क्योंकि ये लोग खुद वैचारिक रूप से मजबूत नहीं है" यह कथन है AISF , बेगूसराय के एक छात्र नेता राम कृष्ण का ।
 क्योंकि मेरे पिछले पोस्ट प्रकाशन के बाद CPI महासचिव कामरेड द्वारा फेसबुक पर मुझे अंफ्रेंड कर दिया गया है , अतः जगदीश्वर चतुर्वेदी जी की नेक सलाह का वाम नेतृत्व पर कोई प्रभाव पड़ेगा इसकी उम्मीद नगण्य ही है। 

Friday, 7 April 2017
कूपमंडूकता है कम्युनिस्टों की विफलता का कारण
http://communistvijai.blogspot.in/2017/04/blog-post.html

वस्तुतः यू पी भाकपा में  मास्को रिटर्ण्ड  एक डिफ़ेक्टो प्रशासक हैं जो निर्वाचित सचिव व सह - सचिव को स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने देते हैं उनका खुद का दावा है कि, जिस दिन लोगों को पता चल जाएगा कि,' गिरीश 'की पीठ पर उनका अब हाथ नहीं है उसी दिन उनका हटना तय हो जाएगा। इस संबंध में फोन पर एक राष्ट्रीय सचिव से भी उन्होने झूठा वायदा किया था जिसे पूरा करने का प्रश्न ही नहीं था। अरविंद जी के संबंध में भी उन्होने कहा था कि, वह भी ज़्यादा अच्छे नहीं हैं। अपने जिस दत्तक पुत्र को एक ही पद पर लगभग 25 वर्षों से बैठाये हुये हैं और जिनके जरिये प्रत्येक राज्य सचिव को प्राभावित करते रहते हैं उनको ही वह अगला राज्य सचिव बनाने की जोड़ - तोड़ बैठा रहे हैं। 
उनका ही यह कहना / निर्देश है कि, obc व sc कामरेड्स से सिर्फ काम लिया जाये परंतु कोई पद न दिया जाये। 2012 में sc व 2014 उपचुनाव में obc कामरेड को चुनाव लड़वाया और फिर पार्टी छोडने पर मजबूर कर दिया। इससे पहले दो-दो बार पार्टी को प्रदेश में तोड़ चुके थे।  कामरेड मित्रसेन यादव जी और कौशल किशोर जी (वर्तमान भाजापा सांसद )  को पार्टी से कैसे निकलवाया इससे भी सभी  पूरी तरह से वाकिफ हैं । 

जी हाँ वह पंडित  जी हैं। वह पंडित दत्तक पुत्र  को उसी प्रकार सपोर्ट कर रहे हैं जिस प्रकार कामरेड काली शंकर शुक्ला जी ने रमेश कटारा को सपोर्ट किया था। उस घटनाक्रम से  भी सब  पूरी तरह वाकिफ ही हैं।  उनका यह भी कहना है कि, अगर बैंक से पार्टी अकाउंट से रु 28000/- निकलते हैं तो उसमें से रु 18000/- गिरीश जी की जीप के डीजल पर खर्च होते हैं और रु 10000/-हज़ार में पूरी पार्टी चलती है।  
 यदि यू पी में भाकपा को पुनर्जीवित करना है  और वामपंथ को वस्तुतः मजबूत करना है तो इन डिफ़ेक्टो साहब को मय उनके दत्तक पुत्र के यू पी से हटाना होगा।
(विजय राजबली माथुर )