Thursday 13 April 2017

इंटरनेट माध्यम से पार्टी नेता की जड़ता, मूर्खता,कूपमंडूकता आदि से मुक्ति मिलेगी ------ जगदीश्वर चतुर्वेदी

*वामदल आज हाशिए पर हैं उसके कई कारण हैं उनमें एक बड़ा कारण है कम्युनिकेशन की नई वास्तविकता को आत्मसात न कर पाना। वे क्यों इंटरनेट के संदर्भ में अपनी गतिविधियों और संचार की भूमिका को सुसंगठित रुप नहीं दे पाए हैं यह समझना मुश्किल है। --- जगदीश्वर चतुर्वेदी 
*"क्योंकि ये लोग खुद वैचारिक रूप से मजबूत नहीं है" ---AISF नेता राम कृष्ण 
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Jagadishwar Chaturvedi
इंटरनेट और उससे जुड़े माध्यमों और विधा रुपों के आने के बाद से संचार की दुनिया में मूलगामी बदलाव आया है। वैचारिक संघर्ष पहले की तुलना में और भी ज़्यादा जटिल और तीव्र हो गया है। जनसंपर्क और जनसंवाद पहले की तुलना में कम खर्चीला और प्रभावशाली हो गया है। लेकिन वामदलों और ख़ासकर कम्युनिस्ट पार्टियों में इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल नज़र नहीं आती। यह सच है कि वामदलों के पास बुद्धिजीवियों का बहुत बड़ा ज़ख़ीरा है और ज्ञान के मामले में ये लोग विभिन्न क्षेत्र में बेजोड़ हैं। आज भी भारत की बेहतरीन समझ के विभिन्न क्षेत्रों में मानक इन्होंने ही बनाए हैं। लेकिन इंटरनेट जैसे प्रभावशाली माध्यम के आने के बाद वामदलों के रवैय्ये में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है।वामदल आज हाशिए पर हैं उसके कई कारण हैं उनमें एक बड़ा कारण है कम्युनिकेशन की नई वास्तविकता को आत्मसात न कर पाना। वे क्यों इंटरनेट के संदर्भ में अपनी गतिविधियों और संचार की भूमिका को सुसंगठित रुप नहीं दे पाए हैं यह समझना मुश्किल है। 
वामदल जानते हैं कि नेट कम्युनिकेशन न्यूनतम खर्चे पर चलने वाला कम्युनिकेशन है। यह ऐसा कम्युनिकेशन है जो लोकतांत्रिक होने के लिए मजबूर करता है। यह दुतरफ़ा कम्युनिकेशन है। यहाँ दाता और गृहीता एक ही धरातल पर रहते हैं और रीयल टाइम में मिलते हैं। यहाँ आप अपनी-अपनी कहने के लिए स्वतंत्र हैं साथ ही अन्य की रीयल टाइम में सुनने ,सीखने और बदलने के लिए भी मजबूर हैं। विचारों में साझेदारी और उदारता इसका बुनियादी आधार है। 
वामदलों की नियोजित नेट गतिविधियाँ इकतरफ़ा कम्युनिकेशन की हैं और इसे बदलना चाहिए। दुतरफ़ा कम्युनिकेशन की पद्धति अपनानी चाहिए। वामदलों की वेबसाइट हैं लेकिन वहाँ यूजरों के लिए संवाद की कोई खुली जगह नहीं है।वामदलों के बुद्धिजीवियों- लेखकों आदि को कम्युनिकेशन के प्रति अपने पुराने संस्कारों को नष्ट करना होगा। 'हम कहेंगे वे सुनेंगे', ' हम लिखेंगे वे पढेंगे' , 'हम देंगे वे लेंगे' इस सोच के ढाँचे को पूरी तरह नष्ट करने की ज़रुरत है। नये दौर का नारा है 'हम कहेंगे और सीखेंगे',' हम कहेंगे और बदलेंगे'। 
इंटरनेट कम्युनिकेशन आत्मनिर्भर संचार पर ज़ोर देता है । वामदलों के लोग परनिर्भर संचार में जीते रहे हैं। नए दौर की माँग है आत्मनिर्भर बनो। रीयल टाइम में बोलो। बिना किसी की इजाज़त के बोलो।पार्टी की लक्ष्मणरेखा के बाहर निकलकर लोकतान्त्रिक कम्युनिकेशन में शामिल हो और लोकतांत्रिक ढंग से कम्युनिकेट करो। पार्टी में नेता को हक़ है बोलने का , नेता को हक़ है लाइन देने का, पार्टी अख़बार में नेता को हक़ है लिखने का। लेकिन इंटरनेट में प्रत्येक पार्टी सदस्य और हमदर्द को हक़ है बोलने, लिखने और अपनी राय ज़ाहिर करने का। यह राय ज़ाहिर करने का वैध और लोकतांत्रिक मीडियम है । यह प्रौपेगैण्डा का भी प्रभावशाली मीडियम है। यह कम खर्चीला मीडियम है और इसमें शामिल होकर सक्रिय रहने से संचार की रुढियों से मुक्ति मिलने की भी संभावनाएँ हैं। अभी स्थिति यह है कि फ़ेसबुक पर वाम मित्र लाइक करने, एकाध पोस्ट लिखने, फ़ोटो शेयर करने से आगे बढ़ नहीं पाए हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए और वामदलों को सुनियोजित ढंग से अपने सदस्यों को खुलकर इंटरनेट माध्यमों पर अपनी राय ज़ाहिर करने के लिए प्रेरित करना चाहिए इससे पार्टी नेता की जड़ता, मूर्खता,कूपमंडूकता आदि से मुक्ति मिलेगी।
https://www.facebook.com/jagadishwar9/posts/1608776012484433

"क्योंकि ये लोग खुद वैचारिक रूप से मजबूत नहीं है"  ------  "क्योंकि ये लोग खुद वैचारिक रूप से मजबूत नहीं है" यह कथन है AISF , बेगूसराय के एक छात्र नेता राम कृष्ण का ।
 क्योंकि मेरे पिछले पोस्ट प्रकाशन के बाद CPI महासचिव कामरेड द्वारा फेसबुक पर मुझे अंफ्रेंड कर दिया गया है , अतः जगदीश्वर चतुर्वेदी जी की नेक सलाह का वाम नेतृत्व पर कोई प्रभाव पड़ेगा इसकी उम्मीद नगण्य ही है। 

Friday, 7 April 2017
कूपमंडूकता है कम्युनिस्टों की विफलता का कारण
http://communistvijai.blogspot.in/2017/04/blog-post.html

वस्तुतः यू पी भाकपा में  मास्को रिटर्ण्ड  एक डिफ़ेक्टो प्रशासक हैं जो निर्वाचित सचिव व सह - सचिव को स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने देते हैं उनका खुद का दावा है कि, जिस दिन लोगों को पता चल जाएगा कि,' गिरीश 'की पीठ पर उनका अब हाथ नहीं है उसी दिन उनका हटना तय हो जाएगा। इस संबंध में फोन पर एक राष्ट्रीय सचिव से भी उन्होने झूठा वायदा किया था जिसे पूरा करने का प्रश्न ही नहीं था। अरविंद जी के संबंध में भी उन्होने कहा था कि, वह भी ज़्यादा अच्छे नहीं हैं। अपने जिस दत्तक पुत्र को एक ही पद पर लगभग 25 वर्षों से बैठाये हुये हैं और जिनके जरिये प्रत्येक राज्य सचिव को प्राभावित करते रहते हैं उनको ही वह अगला राज्य सचिव बनाने की जोड़ - तोड़ बैठा रहे हैं। 
उनका ही यह कहना / निर्देश है कि, obc व sc कामरेड्स से सिर्फ काम लिया जाये परंतु कोई पद न दिया जाये। 2012 में sc व 2014 उपचुनाव में obc कामरेड को चुनाव लड़वाया और फिर पार्टी छोडने पर मजबूर कर दिया। इससे पहले दो-दो बार पार्टी को प्रदेश में तोड़ चुके थे।  कामरेड मित्रसेन यादव जी और कौशल किशोर जी (वर्तमान भाजापा सांसद )  को पार्टी से कैसे निकलवाया इससे भी सभी  पूरी तरह से वाकिफ हैं । 

जी हाँ वह पंडित  जी हैं। वह पंडित दत्तक पुत्र  को उसी प्रकार सपोर्ट कर रहे हैं जिस प्रकार कामरेड काली शंकर शुक्ला जी ने रमेश कटारा को सपोर्ट किया था। उस घटनाक्रम से  भी सब  पूरी तरह वाकिफ ही हैं।  उनका यह भी कहना है कि, अगर बैंक से पार्टी अकाउंट से रु 28000/- निकलते हैं तो उसमें से रु 18000/- गिरीश जी की जीप के डीजल पर खर्च होते हैं और रु 10000/-हज़ार में पूरी पार्टी चलती है।  
 यदि यू पी में भाकपा को पुनर्जीवित करना है  और वामपंथ को वस्तुतः मजबूत करना है तो इन डिफ़ेक्टो साहब को मय उनके दत्तक पुत्र के यू पी से हटाना होगा।
(विजय राजबली माथुर )


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